परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं

परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं
धरती पर सतलोक संत रामपाल जी महाराज ने उतार दिया है सतलोक आश्रम में

सोमवार, 3 अगस्त 2015

गरुड़ पुराण ज्ञान = नहीं करना चाहिए इन 10 लोगों के घर भोजन

गरुड़ पुराण ज्ञान  =  नहीं करना चाहिए इन 10 लोगों के घर भोजन



गरुण पुराण, वेदव्यास जी द्वारा रचित 18 पुराणो में से एक है। गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके अलावा भी इस ग्रन्थ में कई मानव उपयोगी बातें लिखी है जिनमे से एक है की किस तरह के लोगों के घर भोजन नहीं करना चाहिए।
क्योंकि एक पुरानी कहावत है, जैसा खाएंगे अन्न, वैसा बनेगा मन। यानी हम जैसा भोजन करते हैं, ठीक वैसी ही सोच और विचार बनते हैं। इसका सबसे सशक्त उदाहरण महाभारत में मिलता है जब तीरों की शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से द्रोपदी पूंछती है- "आखिर क्यों उन्होंने भरी सभा में मेरे चीरहरण का विरोध नहीं किया जबकि वो सबसे बड़े और सबसे सशक्त थे।" तब भीष्म पितामह कहते है की मनुष्य जैसा अन्न खता है वैसा ही उसका मन हो जाता है। उस वक़्त में कौरवों का अधर्मी अन्न खा रहा था इसलिए मेरा दिमाग भी वैसा ही हो गया और मुझे उस कृत्य में कुछ गलत नज़र नहीं आया।
हमारे समाज में एक परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है कि लोग एक-दूसरे के घर पर भोजन करने जाते हैं। कई बार दूसरे लोग हमें खाने की चीजें देते हैं। वैसे तो यह एक सामान्य सी बात है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किन लोगों के यहां हमें भोजन नहीं करना चाहिए।
गरुड़ पुराण के आचार कांड में बताया गया है कि हमें किन 10 लोगों के यहां भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि हम इन लोगों के द्वारा दी गई खाने की चीज खाते हैं या इनके घर भोजन करते हैं तो इससे हमारे पापों में वृद्धि होती है। यहां जानिए ये 10 लोग कौन-कौन हैं और इनके घर पर भोजन क्यों नहीं करना चाहिए...
1. कोई चोर या अपराधी
कोई व्यक्ति चोर है, न्यायालय में उसका अपराधी सिद्ध हो गया हो तो उसके घर का भोजन नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार चोर के यहां का भोजन करने पर उसके पापों का असर हमारे जीवन पर भी हो सकता है।
2. चरित्रहीन स्त्री
इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चरित्रहीन स्त्री के हाथ से बना हुआ या उसके घर पर भोजन नहीं करना चाहिए। यहां चरित्रहीन स्त्री का अर्थ यह है कि जो स्त्री स्वेच्छा से पूरी तरह अधार्मिक आचरण करती है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति ऐसी स्त्री के यहां भोजन करता है, वह भी उसके पापों का फल प्राप्त करता है।
3. सूदखोर
वैसे तो आज के समय में काफी लोग ब्याज पर दूसरों को पैसा देते हैं, लेकिन जो लोग दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए अनुचित रूप से अत्यधिक ब्याज प्राप्त करते हैं, गरुड़ पुराण के अनुसार उनके घर पर भी भोजन नहीं करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में दूसरों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाना पाप माना गया है। गलत ढंग से कमाया गया धन, अशुभ फल ही देता है।
4. रोगी व्यक्ति
यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, कोई व्यक्ति छूत के रोग का मरीज है तो उसके घर भी भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के यहां भोजन करने पर हम भी उस बीमारी की गिरफ्त में आ सकते हैं। लंबे समय से रोगी इंसान के घर के वातावरण में भी बीमारियों के कीटाणु हो सकते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
5. अत्यधिक क्रोधी व्यक्ति
क्रोध इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है। अक्सर क्रोध के आवेश में व्यक्ति अच्छे और बुरे का फर्क भूल जाता है। इसी कारण व्यक्ति को हानि भी उठानी पड़ती है। जो लोग हमेशा ही क्रोधित रहते हैं, उनके यहां भी भोजन नहीं करना चाहिए। यदि हम उनके यहां भोजन करेंगे तो उनके क्रोध के गुण हमारे अंदर भी प्रवेश कर सकते हैं।
6. नपुंसक या किन्नर
किन्नरों को दान देने का विशेष विधान बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इन्हें दान देने पर हमें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इन्हें दान देना चाहिए, लेकिन इनके यहां भोजन नहीं करना चाहिए। किन्नर कई प्रकार के लोगों से दान में धन प्राप्त करते हैं। इन्हें दान देने वालों में अच्छे-बुरे, दोनों प्रकार के लोग होते हैं।
7. निर्दयी व्यक्ति
यदि कोई व्यक्ति निर्दयी है, दूसरों के प्रति मानवीय भाव नहीं रखता है, सभी को कष्ट देते रहता है तो उसके घर का भी भोजन नहीं खाना चाहिए। ऐसे लोगों द्वारा अर्जित किए गए धन से बना खाना हमारा स्वभाव भी वैसा ही बना सकता है। हम भी निर्दयी बन सकते हैं। जैसा खाना हम खाते हैं, हमारी सोच और विचार भी वैसे ही बनते हैं।
8. निर्दयी राजा
यदि कोई राजा निर्दयी है और अपनी प्रजा का ध्यान न रखते हुए सभी को कष्ट देता है तो उसके यहां का भोजन नहीं करना चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि प्रजा का ध्यान रखें और अपने अधीन रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करें। जो राजा इस बात का ध्यान न रखते हुए सभी को सताता है, उसके यहां का भोजन नहीं खाना चाहिए।
9. चुगलखोर व्यक्ति
जिन लोगों की आदत दूसरों की चुगली करने की होती है, उनके यहां या उनके द्वारा दिए गए खाने को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। चुगली करना बुरी आदत है। चुगली करने वाले लोग दूसरों को परेशानियों फंसा देते हैं और स्वयं आनंद उठाते हैं। इस काम को भी पाप की श्रेणी में रखा गया है। अत: ऐसे लोगों के यहां भोजन करने से बचना चाहिए।
10. नशीली चीजें बेचने वाले
नशा करना भी पाप की श्रेणी में ही आता है और जो लोग नशीली चीजों का व्यापार करते हैं, गरुड़ पुराण में उनका यहां भोजन करना वर्जित किया गया है। नशे के कारण कई लोगों के घर बर्बाद हो जाते हैं। इसका दोष नशा बेचने वालों को भी लगता है। ऐसे लोगों के यहां भोजन करने पर उनके पाप का असर हमारे जीवन पर भी होता...

बुधवार, 29 जुलाई 2015

औषधि गूलर वृक्ष

औषधि गूलर वृक्ष 

* गूलर लंबी आयु वाला वृक्ष है। इे एवं दलदली स्थानों पर उगता है। उत्तर प्रदेश के मैदानों में यह अपने आप ही उग आता है।
इसका वनस्पतिक नाम फीकुस ग्लोमेराता रौक्सबुर्ग है। यह सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है। यह नदी−नालों के किनारे ज्यादा पाए जाते है 
* इसके भालाकार पत्ते 10 से सत्रह सेमी लंबे होते हैं जो जनवरी से अप्रैल तक निकलते हैं। इसकी छाल का रंग लाल−घूसर होता है। फल गोल, गुच्छों में लगते हैं। फल मार्च से जून तक आते हैं। कच्चा फल छोटा हरा होता है पकने पर फल मीठे, मुलायम तथा छोटे−छोटे दानों से युक्त होता है। इसका फल देखने में अंजीर के फल जैसा लगता है। इसके तने से क्षीर निकलता है।
* गूलर का कच्चा फल कसैला एवं दाहनाशक है। पका हुआ गूलर रुचिकारक, मीठा, शीतल, पित्तशामक, तृषाशामक, श्रमहर, कब्ज मिटाने वाला तथा पौष्टिक है। इसकी जड़ में ‪#‎रक्तस्राव‬ रोकने तथा जलन शांत करने का गुण है। गूलर के कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है तथा पके फल खाए जाते हैं। इसकी छाल का चूर्ण बनाकर या अन्य प्रकार से उपयोग किया जाता है।
* गूलर के नियमित सेवन से शरीर में पित्त एवं कफ का संतुलन बना रहता है। इसलिए पित्त एवं कफ विकार नहीं होते। साथ ही इससे उदरस्थ अग्नि एवं दाह भी शांत होते हैं। पित्त रोगों में इसके पत्तों के चूर्ण का शहद के साथ सेवन भी फायदेमंद होता है।
* गूलर की छाल ग्राही है, रक्तस्राव को बंद करती है। साथ ही यह मधुमेह में भी लाभप्रद है। गूलर के कोमल−ताजा पत्तों का रस शहद में मिलाकर पीने से भी मधुमेह में राहत मिलती है। इससे पेशाब में शर्करा की मात्रा भी कम हो जाती है।
* गूलर के तने को दूध बवासीर एवं दस्तों के लिए श्रेष्ठ दवा है। ‪#‎खूनी‬ बवासीर के रोगी को गूलर के ताजा पत्तों का रस पिलाना चाहिए। इसके नियमित सेवन से त्वचा का रंग भी निखरने लगता है।
* हाथ−पैरों की त्वचा फटने या ‪#‎बिवाई‬ फटने पर गूलर के तने के दूध का लेप करने से आराम मिलता है, पीड़ा से छुटकारा मिलता है।
* गूलर से स्त्रियों की मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं भी दूर होती हैं। स्त्रियों में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर इसकी छाल के काढ़े का सेवन करना चाहिए। इससे अत्याधिक बहाव रुक जाता है। ऐसा होने पर गूलर के पके हुए फलों के रस में खांड या शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक होता है।
* विभिन्न योनि विकारों में भी गूलर काफी फायदेमंद होता है। योनि विकारों में योनि प्रक्षालन के लिए गूलर की छाल के काढ़े का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद होता है।
* मुंह के छाले हों तो गूलर के पत्तों या ‪#‎छाल‬ का काढ़ा मुंह में भरकर कुछ देर रखना चाहिए। इससे फायदा होता है। इससे दांत हिलने तथा मसूढ़ों से खून आने जैसी व्याधियों का निदान भी हो जाता है। यह क्रिया लगभग दो सप्ताह तक प्रतिदिन नियमित रूप से करें।
* आग से या अन्य किसी प्रकार से जल जाने पर प्रभावित स्थान पर गूलर की छाल को लेप करने से जलन शांत हो जाती है। इससे खून का बहना भी बंद हो जाता है। पके हुए गूलर के शरबत में शक्कर, खांड या शहद मिलाकर सेवन करने से गर्मियों में पैदा होने वाली जलन तथा तृषा शांत होती है।
* नेत्र विकारों जैसे आंखें लाल होना, आंखों में पानी आना, जलन होना आदि के उपचार में भी गूलर उपयोगी है। इसके लिए गूलर के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसे साफ और महीन कपड़े से छान लें। ठंडा होने पर इसकी दो−दो बूंद दिन में तीन बार आंखों में डालें। इससे नेत्र ज्योति भी बढ़ती है।
* नकसीर फूटती हो तो ताजा एवं पके हुए गूलर के लगभग 25 मिली लीटर रस में गुड़ या शहद मिलाकर सेवन करने या नकसीर फूटना बंद हो जाती है।
* धातुदुर्बलता के लिए 1 बताशे में 10 बूंद गूलर का दूध डालकर सुबह-शाम सेवन करने और 1 चम्मच की मात्रा में गूलर के फलों का चूर्ण रात में सोने से पहले लेने से धातु दुर्बलता दूर हो जाती है। इस प्रकार से इसका उपयोग करने से शीघ्रपतन रोग भी ठीक हो जाता है।
* मर्दाना शक्तिवर्द्धक के लिए 1 छुहारे की गुठली निकालकर उसमें गूलर के दूध की 25 बूंद भरकर सुबह रोजाना खाये इससे वीर्य में शुक्राणु बढ़ते हैं तथा संतानोत्पत्ति में शुक्राणुओं की कमी का दोष भी दूर हो जाता है।
*1 चम्मच गूलर के दूध में 2 बताशे को पीसकर मिला लें और रोजाना सुबह-शाम इसे खाकर उसके ऊपर से गर्म दूध पीएं इससे मर्दाना कमजोरी दूर होती है।
* पका हुआ गूलर सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में इसी के बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी बोतल में भर कर रख दें। इस चूर्ण में से 2 चम्मच की मात्रा गर्म दूध के साथ सेवन करने से मर्दाना शक्ति बढ़ जाती है। 2-2 घंटे के अन्तराल पर गूलर का दूध या गूलर का यह चूर्ण सेवन करने से दम्पत्ति वैवाहिक सुख को भोगते हुए स्वस्थ संतान को जन्म देते हैं।
* बाजीकारक (काम उत्तेजना) के लिए 4 से 6 ग्राम गूलर के फल का चूर्ण और बिदारी कन्द का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्री और घी मिले हुए दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पौरुष शक्ति की वृद्धि होती है व बाजीकरण की शक्ति बढ़ जाती है। यदि इस चूर्ण का उपयोग इस प्रकार से स्त्रियां करें तो उनके सारे रोग ठीक हो जाएंगे।
** गर्मी के मौसम में गूलर के पके फलों का शर्बत बनाकर पीने से मन प्रसन्न होता है और शरीर में शक्ति की वृद्धि होती है तथा कई प्रकार के रोग जैसे- कब्ज तथा ‪#‎खांसी‬ और दमा आदि ठीक हो जाते हैं।
* उपदंश (फिरंग) के लिए 40 ग्राम गूलर की छाल को 1 लीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर पीने से उपदंश की बीमारी ठीक हो जाती है।
* शरीर को शक्तिशाली बनाने के लिए लगभग 100 ग्राम की मात्रा में गूलर के कच्चे फलों का चूर्ण बनाकर इसमें 100 ग्राम मिश्री मिलाकर रख दें। अब इस चूर्ण में से लगभग 10 ग्राम की मात्रा में रोजाना दूध के साथ लेने से शरीर को भरपूर ताकत मिलती है।
* प्रदर के लिए गूलर के फूलों के चूर्ण को छानकर उसमें शहद एव मिश्री मिलाकर गोली बना लें। रोजाना 1 गोली का सेवन करने से 7 दिन में प्रदर रोग से छुटकार मिल जाता है।
* गूलर के पके फल को छिलके सहित खाकर ऊपर से ताजे पानी पीयें इससे श्वेत प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
* गूलर के फलों के रस में शहद मिलाकर सेवन करने से ‪#‎प्रदर‬ रोग में आराम मिलता है।
* रक्तप्रदर के लिए गूलर की छाल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में या फल 2 से 4 की मात्रा में सुबह-शाम चीनी मिले दूध के साथ सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है तथा रक्तप्रदर रोग ठीक हो जाता है।
* 20 ग्राम गूलर की ताजी छाल को 250 मिलीलीटर पानी में उबालें जब यह 50 मिलीलीटर की मात्रा में बच जाए तो इसमें 25 ग्राम मिश्री और 2 ग्राम सफेद जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करें इससे रक्तप्रदर रोग में लाभ मिलता है।
* पके गूलर के फलों को सुखाकर इसे कूटे और पीसकर छानकर चूर्ण बना लें। फिर इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी ढक्कनदार बर्तन में भर कर रख दें। इसमें से 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम दूध या पानी के साथ सेवन करने से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है।
* पके गूलर के फल को लेकर उसके बीज को निकाल कर फेंक दें, जब उसके फल शेष रह जायें तो उसका रस निकाल कर शहद के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ मिलता है। रोगी इसके सब्जी का सेवन भी कर सकते हैं।
* 1 चम्मच गूलर के फल का रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करने से कुछ ही हफ्तों में न केवल रक्त प्रदर ठीक होता है बल्कि ‪#‎मासिकधर्म‬ में खून अधिक आने की तकलीफ भी दूर होती है।
* श्वेत प्रदर के लिए रोजाना दिन में 3-4 बार गूलर के पके हुए फल खाने से श्वेत प्रदर में लाभ मिलता है।
* गूलर का रस 5 से 10 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर नाभि के निचले हिस्से में पूरे पेट पर इससे लेप करें। इससे श्वेत प्रदर रोग में आराम मिलता है।
** महिलाओ के श्वेत प्रदर के लिए 1 किलो कच्चे गूलर लेकर इसके 3 भाग कर लें। इसमें से ‪#‎कच्चे‬गूलर 1 भाग उबाल लें और इनकों पीसकर 1 चम्मच सरसों के तेल में फ्राई कर लें तथा इसकी रोटी बना लें। रात को सोते समय रोटी को नाभि के ऊपर रखकर कपड़ा बांध लें। इस प्रकार शेष 2 भागों से इसी प्रकार की क्रिया 2 दिनों तक करें इससे श्वेत प्रदर रोग की अवस्था में आराम मिलता है।
* 10-15 ग्राम गूलर की छाल को पीसकर, 250 मिलीलीटर पानी में डालकर पकाएं। पकने के बाद 125 मिलीलीटर पानी शेष रहने पर इसे छान लें और इसमें मिश्री व लगभग 2 ग्राम सफेद जीरे का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें तथा भोजन में इसके कच्चे फलों का काढ़ा बनाकर सेवन करें श्वेत प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
* गर्भपात ... गर्भावस्था में खून का बहना और गर्भपात होने के लक्षण दिखाई दें तो तुरन्त ही गूलर की छाल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में अथवा 2 से 4 गूलर के फल को पीसकर इसमें चीनी मिलाकर दूध के साथ पीएं। जब तक रोग के लक्षण दूर न हो तब तक इसका प्रयोग 4 से 6 घंटे पर उपयोग में लें।
* गूलर की जड़ अथवा जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से गर्भस्राव अथवा गर्भपात होना बंद हो जाता है।
* भगन्दर के लिए गूलर के दूध में रूई का फोहा भिगोंकर इसे नासूर और भगन्दर के ऊपर रखें और इसे प्रतिदिन बदलते रहने से नासूर और भगन्दर ठीक हो जाता है।
* खूनी बवासीर के लिए गूलर के पत्तों या फलों के दूध की 10 से 20 बूंदे को पानी में मिलाकर रोगी को पिलाने से खूनी बवासीर और रक्तविकार दूर हो जाते हैं। गूलर के दूध का लेप मस्सों पर भी लगाना लाभकारी है।
* 10 से 15 ग्राम गूलर के कोमल पत्तों को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। 250 ग्राम गाय के दूध की दही में थोड़ा सा सेंधानमक तथा इस चूर्ण को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से खूनी बवासीर के रोग में लाभ मिलता है।
* आंव (पेचिश) के लिए 5 से 10 ग्राम गूलर की जड़ का रस सुबह-शाम चीनी मिले दूध के साथ सेवन करने से आमातिसार (पेचिश) ठीक हो जाता है।
* बताशे में गूलर के दूध की 4-5 बूंदे डालकर रोगी को खिलाने से आमातिसार (आंव) ठीक हो जाता है।
* गूलर के पके फल खायें इससे पेचिश रोग ठीक हो जाता है।
* गूलर को गर्म जल में उबालकर छान लें और इसे पीसकर रोटी बना लें फिर इसे खाएं इससे पेचिश में लाभ होता है |
* दस्त के लिए ...दस्त और ग्रहणी के रोग में 3 ग्राम गूलर के पत्तों का चूर्ण और 2 दाने कालीमिर्च के थोड़े से चावल के पानी के साथ बारीक पीसकर, उसमें कालानमक और छाछ मिलाकर फिर इसे छान लें और इसे सुबह-शाम सेवन करें इससे लाभ मिलेगा।
* गूलर की 10 ग्राम पत्तियां को बारीक पीसकर 50 मिलीलीटर पानी में डालकर रोगी को पिलाने से सभी प्रकार के दस्त समाप्त हो जाते हैं।
* बच्चों का आंव....गूलर के दूध की 5-6 बूंदे चीनी के साथ बच्चे को देने से बच्चों के आंव ठीक हो जाते हैं।
* विसूचिका....विसूचिका (हैजा) के रोगी को गूलर का रस पिलाने से रोगी को आराम मिलता है।
* रक्तपित्त (खूनी पित्त) के लिए पके हुए हुए गूलर, गुड़ या शहद के साथ खाना चाहिए अथवा गूलर की जड़ को घिसकर चीनी के साथ खाने से लाभ मिलेगा और रक्तपित्त दोष दूर हो जाएगा।
* हर प्रकार के रक्तपित्त में गूलर की छाल 5 ग्राम से 10 ग्राम तथा उसका फल 2 से 4 ग्राम तथा गूलर का दूध 10 से 20 मिलीलीटर की मात्रा के रूप में सेवन करने से लाभ मिलता है।
* फोड़े पर गूलर का दूध लगाकर उस पर पतला कागज चिपकाने से फोड़ा जल्दी ठीक हो जाता है।
* शरीर के अंगों में घाव होने पर गूलर की छाल से घाव को धोएं इससे घाव जल्दी ही भर जाते हैं।
* गूलर के पत्तों को छांया में सूखाकर इसे पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसके बाद घाव को साफ करकें इसके ऊपर इस चूर्ण को छिड़के तथा इस चूर्ण में से 5-5 ग्राम की मात्रा सुबह तथा शाम को पानी के साथ सेवन करें इससे लाभ मिलेगा।
* गूलर के दूध में बावची को भिगोंकर इसे पीस लें और 1-2 चम्मच की मात्रा में रोजाना इससे घाव पर लेप करें इससे घाव जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
* गूलर के पत्तों को पानी के साथ पीसकर शर्बत बनाकर पीने से मधुमेह रोग में लाभ मिलता है।
* गूलर के ताजे फल को खाकर ऊपर से ताजे पानी पीये इससे मधुमेह रोग में आराम मिलता है।
* शीतला (चेचक) के लिए गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को गाय के ताजे दूध में पीसकर इसमें थोड़ी सी चीनी मिलाकर चेचक से पीड़ित रोगी को पिलाये इससे उसका यह रोग ठीक हो जाएगा।
* भिलावें की धुएं से उत्पन्न हुई सूजन को दूर करने के लिए गूलर की छाल को पीसकर इससे सूजन वाली भाग पर लेप करें।
* शरीर के किसी भी अंग पर गांठ होने की अवस्था में गूलर का दूध उस अंग पर लगाने से लाभ मिलता है।
* पेशाब अधिक आना....1 चम्मच गूलर के कच्चे फलों के चूर्ण को 2 चम्मच शहद और दूध के साथ सेवन करने से पेशाब का अधिक मात्रा में आने का रोग दूर हो जाता है।
* पेशाब के साथ खून आना....पेशाब में खून आने पर गूलर की छाल 5 ग्राम से 10 ग्राम या इसके फल 2 से 4 लेकर पीस लें और इसमें चीनी मिलाकर दूध के साथ खायें इससे यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
* मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन) होना....प्रतिदिन सुबह गूलर के 2-2 पके फल रोगी को सेवन करने से मूत्रकच्छ (पेशाब की जलन) में लाभ मिलता है।
* गूलर के 8-10 बूंद को 2 बताशों में भरकर रोजाना सेवन करने से मूत्ररोग (पेशाब के रोग) तथा पेशाब करने के समय में होने वाले कष्ट तथा जलन दूर हो जाती है।
* मधुमेह के लिए 1 चम्मच गूलर के फलों के चूर्ण को 1 कप पानी के साथ दोनों समय भोजन के बाद नियमित रूप से सेवन करने से पेशाब में शर्करा आना बंद हो जाता है। इसके साथ ही गूलर के कच्चे फलों की सब्जी नियमित रूप से खाते रहना अधिक लाभकारी होता है। मधुमेह रोग ठीक हो जाने के बाद इसका सेवन करना बंद कर दें।
* दांतों की मजबूती के लिए गूलर की छाल के काढे़ से गरारे करते रहने से दांत और मसूड़ों के सारे रोग दूर होकर दांत मजबूत होते हैं।
* कंठमाला (गले में गिल्टी होना)....गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को पीसकर इसे मीठे या दही मिला दें और इसमें चीनी मिलाकर रोजाना 1 बार सेवन करें इससे कंठमाला के रोग से मुक्ति मिलती है।
* खांसी के लिए रोगी को बहुत तेज खांसी आती हो तो गूलर का दूध रोगी के मुंह के तालू पर रगड़ने से आराम मिलता है।
* गूलर के फूल, कालीमिर्च और ढाक की कोमल कली को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 5 ग्राम शहद में मिलाकर रोजाना 2-3 बार चाटने से खांसी ठीक हो जाती है।
* नाक से खून बहना .....पके गूलर में चीनी भरकर घी में तलें, इसके बाद इस पर काली मिर्च तथा इलायची के दानों का आधा-आधा ग्राम चूर्ण छिड़कर प्रतिदिन सुबह के समय में सेवन करें तथा इसके बाद बैंगन का रस मुंह पर लगाएं इससे नाक से खून गिरना बंद हो जाता है।
* गूलर का पेड़, शाल पेड़, अर्जुन पेड़, और कुड़े के पड़े की पेड़ की छाल को बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर चटनी बना लें। इन सब चीजों का काढ़ा भी बनाकर रख लें। इसके बाद इस चटनी तथा इससे 4 गुना ज्यादा घी और घी से 4 गुना ज्यादा काढ़े को कढ़ाही में डालकर पकाएं। पकने पर जब घी के बराबर मात्रा रह तो इसे उतार कर छान लें। अगर नाक पक गई हो तो इस घी को नाक पर लगाने से बहुत जल्दी आराम मिलता है।
* रक्तस्राव (खून का बहना)...नाक से, मुंह से, योनि से, गुदा से होने वाले रक्तस्राव में गूलर के दूध की 15 बूंदे 1 चम्मच पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
* शरीर में कहीं से भी किसी कारण से रक्तस्राव (खून बहना) हो रहा हो तो गूलर के पत्तों का रस निकालकर वहां पर लगाएं इससे तुरन्त खून का आना बंद हो जाता है।
* मुंह में छाले हो अथवा खून आता हो या खूनी बवासीर हो तो 1 चम्मच गूलर के दूध में इतनी ही पिसी हुई मिश्री मिलाकर रोजाना खाने से रक्तस्राव (खून बहना) होना बंद हो जाता है तथा इसके सेवन से मुंह के छाले भी ठीक हो जाते हैं।
* चोट लगने पर खून का बहना...गूलर के पत्तों का रस चोट लगे हुए स्थान पर लगने से खून बहना रुक जाता है।
* गूलर के रस को रूई में भिगोकर इसे चोट पर रखकर पट्टी बांध लें इससे चोट जल्दी भरकर ठीक हो जाएगा।
* शिशु का दुबलापन...गूलर का दूध कुछ बूंदों की मात्रा में मां या गाय-भैंस के दूध के साथ मिलाकर नियमित रूप से कुछ महीने तक रोजाना 1 बार बच्चों को पिलाने से शरीर हृष्ट-पुष्ट और सुडौल बनाता है लेकिन गूलर के दूध बच्चों उम्र के अनुसार ही उपयोग में लेना चाहिए।
* सूखा (रिकेट्स) रोग....5 बूंद गूलर के दूध को 1 बताशे पर डालकर इसका सेवन बच्चों को कराएं इससे सूखा रोग (रिकेटस) ठीक हो जाता है।
* बच्चों के गाल पर सूजन होना...बच्चों के गाल की सूजन को दूर करने के लिए उनके गाल पर गूलर के दूध का लेप करें इससे लाभ मिलेगा।
* बिच्छू का जहर...जहां पर बिच्छू ने काटा हो उस स्थान पर गूलर के अंकुरों को पीसकर लगाए इससे जहर चढ़ता नहीं है और दर्द से आराम मिलता है।
* आग से जलने पर ...जलने पर गूलर की हरी पत्तियां पीसकर लेप करने से जलन दूर हो जाती है।
* गूलर के पत्तों को पीसकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से जलन मिट जाती है और छाले के निशान भी नही पड़ते।
* दमा के लिए गूलर की पेड़ की छाल उतारकर छाया में सुखा लें और फिर इसे पीसकर चूर्ण बना लें और फिर इसे छानकर बोतल में भरकर ढक्कन लगाकर रख दें। इसमें से चूर्ण का सेवन प्रतिदिन करने से दमा रोग में लाभ मिलता है।
* सितम्बर से मार्च तक की हर पूर्णमासी की रात में जितना खीर खा सकें, उतने दूध में चावल (इस खीर में अरबा चावल उत्तम माने जाते हैं) डालकर खीर बनाएं। इस खीर को कांसे की थाली में डालकर फैलाकर, इस पर ढाई चम्मच गूलर की छाल का चूर्ण चारो और छिड़क दें। खीर रात को नौ बजे तक तैयार कर लें। इसे रात को नौ बजे से सुबह के चार बजे तक खुले स्थान पर चांदनी में रखें। सुबह चार बजे के तुरन्त बाद इसे भर पेट खा लें। खीर खाने से पहले मंजन करके मुंह को साफ कर लें। आम के हरे पत्ते से खीर खाएं। इसके बाद धीरे-धीरे थकान नहीं हो तब तक घूमते रहें। इससे दमा रोग में लाभ मिलता है।
* जिगर का रोग के लिए 10 ग्राम की मात्रा में ‪#‎जंगली‬ गुलर की जड़ की छाल पीसकर गाय के मूत्र में मिला लें और इसे छानकर 25 ग्राम की मात्रा में रोजाना पीने से से यकृत वृद्धि खत्म जाती है।
* वमन (उल्टी) के लिए गूलर के दूध की 10 बूंदे सुबह और शाम दूध में मिलाकर बच्चों को पिलाने से बच्चों को उल्टी आना बंद हो जाता है।

सोमवार, 27 जुलाई 2015

11 घरेलू नुस्खे - गैस की समस्या

11 घरेलू नुस्खे जो आप को रक्खें सदा स्वस्थ्य


अनियमित खान-पान के कारण कई लोगों को कब्ज की समस्या हो जाती है। ऐसे में, लगातार कब्ज के बने रहने पर गैस की समस्या हो जाती है और यही गैस्ट्रिक कई अन्य समस्याएं, जिन्हें आयुर्वेद की भाषा में वात रोग कहते हैं, का कारण बनती हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिरदर्द, कमरदर्द, पेटदर्द, सीने में दर्द जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं।
जिसे ये समस्या होती है, उसे एसिड रिफ्लक्स की समस्या भी होने लगती हैं। इसके लक्षण मरीज की हालत खराब कर देते हैं, उसे नींद नहीं आती है। कई बार जब ये समस्या अपनी मनपसंद चीज खाने पर हो जाए तो उससे भी तौबा करने का मन होने लगता है। दरअसल, इस समस्या का मुख्य कारण कुछ आदतें या अनियमित दिनचर्या है। यदि आपको भी अक्सर गैस की समस्या हो जाया करती है तो हम बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे आसान घरेलू नुस्खे, जिनसे इस समस्या से बहुत जल्दी राहत मिल जाती है।
गैस की समस्या होने के समान्य लक्षण-
1. मतली।
2. उल्टी।
3. लगातार हिचकी।
4. पेटदर्द और सूजन।
1. हल्दी
हल्दी में एंटी-इन्फ्लामेंट्री व एंटी-फंगल तत्व पाए जाते हैं। यह कई रोगों में दवा का काम करती है। विशेषकर पेट के रोगों में। थोड़ा हल्दी पाउडर ठंडे पानी से लें और फिर दही या केला खाएं।
2. नारियल पानी
नारियल पानी गैस की समस्या में दवा का काम करता है। यह विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर होता है। पेट की समस्याओं को दूर करता है, जब भी गैस की समस्या हो, दो से तीन बार नारियल पानी पिएं। आराम मिलेगा।
3. अदरक
गैस की समस्या में अदरक सबसे बेहतरीन दवा का काम करता है। थोड़ा-सा सूखा अदरक चाय में डालकर पीने से गैस में तुरंत राहत मिल जाती है। अदरक में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इन्फ्लामेंट्री तत्व पाए जाते हैं। यह पेट और एसोफेगस की समस्या तुरंत दूर करने की क्षमता रखता है। इसे लेने से गैस की समस्या पैदा करने वाले जीवाणु खत्म हो जाते हैं। अदरक के एक टुकड़े को घी में सेंककर काला नमक लगाकर खाने पर गैस से छुटकारा मिल जाता है। सूखे अदरक का काढ़ा बनाकर पीने से भी यह समस्या खत्म हो जाती है।
4. पाइन एप्पल
पाइन एप्पल में पाचक एन्जाइम्स मौजूद होते हैं। गैस की समस्या हो तो एल्कलाइन से भरपूर चीजों का सेवन करना चाहिए। पाइन एप्पल में भी एल्कलाइन पाया जाता है। इसीलिए इसके सेवन से गैस की समस्या दूर हो जाती है, लेकिन ये ध्यान रखें हमेशा पका हुआ पाइन एप्पल खाएं। कच्चा पाइन एप्पल पेट को फायदे की बजाए नुकसान पहुंचा सकता है।
5. छाछ
थोड़े मेथीदाने, हल्दी, हींग और जीरा मिलाकर पाउडर बनाकर रख लें। सुबह खाना खाने के बाद इस पाउडर को छाछ में डालकर पिएं। गैस व एसिडिटी की समस्या जड़ से खत्म हो जाएगी।
6. जीरा
जीरा खाने से डायजेस्टिव सिस्टम से जुड़ी समस्याएं दूर हो जाती हैं। इसीलिए जब भी आपको गैस की समस्या परेशान करे, एक चम्मच जीरा पाउडर ठंडे पानी में घोलकर पिएं, बहुत लाभ होगा।
7. पानी पिएं
पानी न पीना या पानी की कमी भी इस समस्या का एक बड़ा कारण है। गैस की समस्या हो या नहीं, दिनभर में कम से कम 8 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए। जब भी गैस की समस्या हो, तो ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं। इससे एसिड बाहर हो जाता है। साथ ही, गैस की समस्या से तुरंत राहत मिलती है।
8.आलू
शायद ये आपको गैस दूर करने वाला सबसे अजीब उपाय लगे, लेकिन आलू का जूस पीने से भी गैस की समस्या दूर हो जाती है। यह एल्कलाइन का एक अच्छा स्रोत है।इसका जूस बनाने के लिए कच्चे आलू को छीलकर पानी डालकर मिक्सर में पीस लें। इस जूस को छानकर इसमें थोड़ा गर्म पानी मिलाकर पिएं। गैस से राहत मिल जाएगी। यह जूस लिवर को भी ठीक रखता है।
9. तुलसी
तुलसी कई बीमारियों में औषधि का काम करती है। रोजाना पांच तुलसी के पत्ते खाने से गैस की समस्या के साथ ही पेट के अन्य कई रोग खत्म हो जाते हैं। गैस की समस्या में तुलसी की चाय बनाकर या उसका रस पीने से भी तुरंत फायदा होता है।
10. लौंग
लौंग एक ऐसा मसाला है, जो गैस की समस्या से परेशान लोगों के लिए एक बेहतरीन औषधि है। लौंग चूसने से या लौंग पाउडर को शहद के साथ लेने से एसिड रिफ्लक्स और गैस की समस्या दूर हो जाती है।
11. पपीता
पपीता बीटा-केरोटीन से भरपूर फल है। इसमें खाना जल्दी पचाने वाले तत्व पाए जाते हैं। पपीता में पेपिन नाम का एन्जाइम पाया जाता है, जो शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है। गैस की समस्या हो रही हो तो खाना कम खाएं। खाने के बाद थोड़ा काला नमक डालकर पपीता खाएं। कब्ज और गैस, दोनों समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

दुर्भाग्य निर्माता ये देश महान


वाह रे मेरे देश महानसंत भगतो पर दादागिरी देश के दुशमनो का करे सम्मान ,ऐसा देश है मेरा हिन्दूस्तान**

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एक संत रामपाल जी, जो भगती कर और करवा रहे थे, जो समाज को विकार रहित और भष्टाचार से मुक्त करवा रहे थे, उन्होनो अपने शिष्यो की बीडी तक छुटवा दी. रामपाल जी का राजनीति से कोई लेना देना नही है, जिन्होने सरकार या जनता से कभी अपने लिए कोई मांग नही की.. जो अपने लाखो चेलो को अपने दम पर बिल्कुल फ्री सभी सुविधाऐ देकर भगती कर और करवा रहे थे.. संत रामपाल जी का कसूर इतना था की उन्होने भष्ट जजो का नाम सर्वजनिक कर दिया था, पहली बार किसी ने भष्ट जजो के खिलाफ अवाज उठाई थी.. वो है संत रामपाल जी..
ये सब उन्होने अपने लिए नही जनता की भलाई के लिए किया था..
कबीर - वृक्ष कबहु ना फल भखे, नदी ना संचवै नीर...
प्रमारथ के कारने, साधु धरा शरीर
कबीर - सरवर तरूवर संतजन, चौथा बरसे मेह..
प्रमारथ के कारने, चारो धरी देह...
सरलार्थ - तरूवर कभी अपने फल नही खाते, तरूवर नदिये कभी अपना जल नही पीते, संतो अपने ज्ञान को अपने तक सीमित नही रखते.. ये सभी प्रमारथ के लिए होते है. जनता की भलाई के लिए होते हैा...
इस जनता की भलाई के कारण आज संत रामपाल जी जेल मे है जिन्होने अपने ज्ञान को अपने अापको जनता के लिए लूठा दिया.. जिस जनता के लिए भष्ट सरकार भष्ट प्रशासन जजो से दुश्मनी मोल ली.. आज वो ही जनता तमाशा देख रही है हंस रही है.. मिडिया उनके खिलाफ बोल रहा है....
.....
****Hindustan Ki Namard Police Force******
एक संत रामपाल जी जो अपने आश्रम मे चुप चाप बैठकर
अपने लाखो शिष्यो से भगती कर और करवा रहा थे उनके आश्रम पर 45000 पुलिस फोर्स भगतो को पीटकर रामपाल जी को गिरफ्तार करने आ गई.. जबकि रामपाल जी ने अपना मैडिकल भी दिया प्रशासन की तरफ से आये डाक्टर टीम ने बीमार बताया.. भष्ट तानाशाही रिश्वतखोर जजो ने उनका मैडिकल ना मानते हुए पुलिस प्रशासन से कहकर निर्दोष औरतो और बच्चो पर लाठिया चलवाई, जिसमे 4 औरत और 2 बच्चे मारे गए... अरे जो भगत माता भाई बहने अपने आश्रम घर मे बैठकर भगती कर रही थी इस नामर्द कायर पुलिस फोर्स ने उन पर लाठिया चलाई..
** ** Ye Kyo Aazad H****
इमाम बुखारी -
पर 150 से ज्यादा मुकदमे है 67 बार गैर जामनती वारंट निकले है हिन्दूस्तान की डरपोक पुलिस कायर सरकार आज तक इसको गिरफ्तार नही कर पाई..ये टुकडा तोडता है हिन्दूस्तान का... PM बुलाता है पकिस्तान का.. ना जाने कितने विवादित बयान दिये है इसने.. ये अभी तक आजाद क्यो है..
असादुदीन ओवेसी का बयान-
1. भारत को दुबारा हिन्दू देश कहा तो भागवत को जमीन मे गाड दूंगा..
2. भारतीय मुसलमानो को पकिस्तानी मुसलमानो से अलग समझने की गलती ना करे हिन्दू.. अगर भारत ने पकिस्तान पर हमला करने की जुर्रत की तो भारत के 25 करोड मुसलमान पकिस्तानी सेना के साथ मिलकर भारत पर हमला करेगे...
aise kitne e gaddaarr h inpr kaarywahi kyu nhi krti corrut govt..
jo hindustan me rehkr Pakistan ke PM ko bulate h.. Jo Hindustan me Pakistan ki baat karte h.. Jo Hindustan ka tukda todte h Or Pakistan ka Jhanda Hilate h... Ye Kyo aazad h????
******* एक संत को देशद्रोही बताना******
वाह रे मेरे देश महान,संत भगतो पर दादागिरी*** देश के दुशमनो का करे सम्मान,ऐसा देश है मेरा हिन्दूस्तान******
संत रामपाल जी को देशद्रोही बता दिया.. जिन्होने देश के खिलाफ के खिलाफ कभी कुछ नही बोला. जिन्होने हमेशा अहिंसा का पाठ सिखाया है. जिनका किसी नेता राजनीति से कोई लेना देना नही है. जो अपने आश्रम मे अपने घर मे बैठकर शान्तिपूर्ण ढंग से बैटकर सतंसग के माध्यम से विकाररहीत भगत समाज बना रहे है.. उनके आश्रम मे जो हथियार मिले है वो लाईसंसी है.. फिर भी बिकाऊ मिडिया के माध्यम से उनको फसाया जा रहा है.. आश्रम से ना कोई पटोल बम फेका गया ना तेजब.. बिकाऊ मिडिया ने कोई एक पुलिस वाला नही दिखाया जो तेजाब या पटोल से जला हो.. आश्रम से ना कोई गोली चली.. कोई एक पुलिस वाला तो बताओ जो आश्रम की गोली से घायल हुआ हो.. सब झूठे इलजाम लगाये गये है.पुलिस जांच करने के बाद ये पता चला कि रामपाल जी का नक्सलियो से कोई सम्बध नही है. बैतून मध्यप्रदेष पुलिस ने हरियाणा पुलिस को झूठा बताते हुए ये वयान दिया है कि बैतून आश्रम मे कोई कमांडो टरेनिंग नही होती थी.. वैसे भी वो आश्रम के भगत थे जो काले कपडो मे खडे थे ना वो कमांडो थे ना उनको कोई टरेनिंग दी गई थी...
रामपाल जी से नाम लेने विदेशो से लोग आते है वो नाम लेकर सतसंग सुनकर चले जाते है.. अगर उन लोगो ने कोई गैरकानूनी काम किये है तो इसमे संत रामपाल जी का कोई दोष नही है..ये काम वहा के प्रशासन का है जहा वो लोग रहते है.
भारत सरकार संतो पर मर्दंगी दादागीरी दिखा रही है.. ऐसा तो कभी अग्रेजो ने भी नही किया था जो आज भारत सरकार कर रही है.. भारत सदा से ही संतो की भूमी रहा है. संतो ने अपने खून पसीने अपने ज्ञान से इसे सींचा है... और आज उन्ही संतो पर ये भष्ट जज भष्ट प्रशासन बिकाऊ मिडिया को साथ लेकर उन पर तरह तरह के झूठे आरोप लगा रहा है. भगत संतो को लाठियो से पीठकर जेल मे डाला जा रहा है.. और देश के दुशमन खुले घूम रहे है.. कहा का न्याय है ये अंधा कानून...
***** CBI जाँच की मांग*******
संत रामपाल जी 2006 से ही CBI जाँच की मांग कर रहे है. लेकिन आज तक उनकी कोई सुनवाई नही हुई है.. हाई कोर्ट रामपाल जी को गिरफ्तार करने के लिए 45000 पुलिस फोर्स भेज सकता है क्या एक CBI जाँच नही करवा सकता... सरकार रामपाल जी को पकडने के लिए 25 करोड रूपये खर्च कर सकती है क्या एक CBI जाँच नही करवा सकती...... आखिर इसका कारण क्या है??????
उत्तर - रामपाल जी निर्दोष है उनको बदनाम करवाने और जेल मे डालने के पीछे बहुत बडी साजिश रची गई है.. इसमे भ्रष्ट जजो, नेताओ, आर्य समाज और नकली धर्म गुरूवो का हाथ है...
संत रामपाल को दुनिया मे ज्ञान चर्चा मे कोई हारा नही सकता.. उनका दिव्य ज्ञान है.. उनके ज्ञान का दुनिया को पता ना चल जाये.. और इन नकली लोगो के झूठे ज्ञान अज्ञान की दुकाने ना बंद हो जाये.. इसलिए ऐसा हुआ है.. सतगुरू रामपाल जी की मांगे बस इतनी थी.. सतलोक आश्रम के करौथा काण्ड की CBI जाँच हो.. सभी जजो की सम्पति को सर्वजनिक किया जाये.. जजो की मनमानी पर रोक लगनी चाहिये, इनके उपर भी कानून बनाया जाए. ये सब कुछ रामपाल जी ने अपने लिए नही बल्कि देश हित के लिए मांगी.. उनका कसूर इतना था कि उन्होने भ्रष्ट जजो का नाम सार्वजनिक कर दिया था.. उनहोने भष्ट जजो के खिलाफ आवाज उठाई...जिसका नतीजा उनको जेल मे डाल दिया..
****** संत भगत रिशवत देते लेते नही*********
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संतरामपाल भी चाहते तो भ्रष्ट जजो को 30 लाख रूपये देकर 2006 के मुकदमो को समाप्त करवा सकते थे वो भी 20000 रूपये देकर जमानत ले सकते थे. जो संत 15 दिन मे एक समागम मे लाखो लोगो पर करोडो रूपये खर्च करके देशी घी का फ्रि भोजन खिला सकता है उसके लिए 30 लाख 20हजार की क्या औकात.. लेकिन रामपाल जी जेल जा सकते है लेकिन इन भ्रष्टाचारियो को एक फूटी कोडी नही दे सकते.. क्योकि संत रामपाल जी अपने शिष्यो को रिश्वत लेने और देने को मना करते है . तो संतरामपाल जी का तो सवाल ही नही उटता.. संत भगत अपने पैसो को भूखो को भोजन खिलाने गरीबो को कपडे देने आदि मे लगाकर पूण्य कमा सकते है.
लेकिन भ्रष्टाचरियो को रिशवत देकर पाप नही कमा सकते.. वो सच के लिए जेल तो क्या सर कटा सकते है मगर झूठ के सामने सर झूका नही सकते..
कबीर - निरंजन धन तेरा दरबार, सच्चो को झूठा बतावे इन झूठो का एतबार....
**** Aisa Desh H Mera Hindustan****
वाह रे मेरे देश महान,संत भगतो पर दादागिरी*** देश के दुशमनो का करे सम्मान,ऐसा देश है मेरा हिन्दूस्तान****
अधिक जानकारी के लिए आप इस website से कोई भी बुक डाउनलोड करके पढ सकते हो..
visit - http://jagatgururampalji.org/booksandpublications.php
www.jagatgururampalji.org
अगर आप संत रामपाल जी के सहयोगी हो या संत रामपाल जी के सच्चे शिष्य हो तो
Plzzzzzzz is Post ko itna Tag karo itna like karo itna Share karo.... की मोदी के 56 इंच के कलेजे मे जाकर लगे..उसको ये एहसास हो जिस भूमी पर तू खडा है उसको संतो भगतो ने अपने खून पसीने से सींचा है..
.इस पोस्ट को सभी न्यूज वालो तक पहुचाये...
...
पीपा दरिया कूद गया कैसी करी ढिटाई..
वो नर पाला जीत गये जिन्होने बाजी सिर धड की लाई..
शिश दिया गुरूदेव को सफल हुआ ये शिश...
नेतानन्द इस शिश पर आप बसे जगदीश...
कबीर - या तो माता भगत जने या दाता या शूर..(शूरवीर)
या फिर बाँझ रह ले क्यो व्यर्थ ग्व्वावे नूर...
***जन जन की ये ही पुकार........बंद करे भ्रष्टाचार****
.....
Sat Saheb++++++++++++++++

फिटकरी का प्रयोग

फिटकरी का  प्रयोग 

फिटकरी एक ऐसा क्रिस्टल है जो सभी घरों में प्रयोग होता है। पुरुष इसे आफ्टरशेव के तौर पर इस्तमाल करते हैं। फिटकरी को पहले जमाने में महिलाएं चेहरे को टाइट बनाने के लिये प्रयोग किया करती थीं। यह लाल व सफेद दौ प्रकार की होती हैं।
1. फिटकरी को चोट या घाव लगने पर इस्तमाल करें। फिटकरी का पानी लगाने से घाव से खून बहना बंद हो जाएगा। आपके इसका चूर्ण बना कर भी प्रयोग कर सकते हैं।
2. चेहरे से झुर्रियों को मिटाने के लिये चेहरे को धो लें। फिर फिटकरी को ठंडे पानी से गीला कर के चेहरे के आस पास हल्के रगडें। अब इसे सूख जाने दें और फिर इसे हाथों से छुड़ा कर साफ कर लें। कुछ महीनों के प्रयोग के बाद आपका चेहरा चमकदार और यंग बन जाएगा।
3. दमा और खांसी है तो, आधा ग्राम फिटकरी को पीस कर शहद के साथ मिक्स कर के चाट लें, आपको तुरंत लाभ होगा। or फुलाई हुई फिटकरी एक तोला और मिश्री दो तोला दोनों को महीन पीसकर रख लें। एक-एक माशा नित्य सवेरे खाने से दमा के रोग में लाभ होता है।
4. एंटीबैक्टीरियलऔर एस्ट्रिजेंट तत्व होने की वजह से यह दंत रोग को दूर कर सकती है। यह माउथवॉश की तरह भी प्रयोग की जा सकती है।* फिटकरी और काली मिर्च पीसकर दांतों की जड़ों में मलने से दांतों की पीड़ा में लाभ होते है।
5. फिटकरी को नहाने के पानी में घोल कर प्रयोग करने से खुजली और शरीर से बदबू आना बंद होती है।
6. कीडे़-मकौडे़ के काट लेने पर फिटकरी के टुकड़े को उस जगह पर रगडे़। इससे सूजन, घाव और लालिमा दूर होगी।
7. फिटकरी को चेहरे पर लगाने से चेहरा गोरा बनता है और त्वचा टोन हो जाती है।
8. एक लीटर पानी में 10 ग्राम फिटकरी का चूर्ण घोल लें। इस घोल से प्रतिदिन सिर धोने से जुएं मर जाती हैं।
9. टांसिल की समस्या होने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और नमक डालकर गरारे करें। इससे टांसिल की समस्या में जल्दी ही आराम मिल जाता है।
10. * कान में फुंसी हो अथवा मवाद आता हो तो एक प्याले में थोड़ी-सी फिटकरी पीसकर पानी डालकर घोलें और पिचकारी द्वारा कान धोएं

आपके अनमोल जीवन के लिए सच जानना जरूरी है

आपके अनमोल जीवन के लिए सच जानना जरूरी है 

ये कबीर साहिब की वाणी है 
कृपया पूरा पढे
सतगुरू पुरुष कबीर हैं चारों युग परवान।
झुठे गुरुवा मर गए हो गए भूत मसान ।।
सतगुरु केवल कबीर साहिब ही हुए है या वह संत हुऐ हैं जिनको उन्होने दर्शन दिए इसका सबूत वह सभी संत आपनी अमृत वाणियों मे दे रहे हैं।
अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड का एक रति नहीं भार ।
सतगुरु पुरुष कबीर है कुल के सृजनहार ।।"whole world creater"
गरीब जम जोरा जासे डरे धर्मराय धरे धीर।
ऐसा सतगुरु एक है अदली अदल कबीर।।-संत गरीब दास जी ।
जिन मोको निज नाम दिया सोई सतगुरु हमार।दादू दुसरा कोई नहीं कबीर सृजनहार ।।
-संत दादू साहेब जी।
धनि कबीर धनि वो संत गुरु जिन परम तत लखाया ।
कहै रैदास सुणौ हौ स्वामी पणै तुमारी आया ।।
-संत रविदास।
चार दाग से सतगुरु न्यारा अजरो अमर शरीर ।
दास मलूक सलूक कहत है खोजो खसम कबीर ।।
-संत मलूक दास जी।
राधास्वामी पंथ काल का चलाया हुआ पंथ है।यदि कबीर साहेब का सूक्ष्म वेद(स्वसम वेद) पढ़ोगे तो उसमें सृष्टि रचना ,पूर्ण परमात्मा तथा अन्य भविष्यवाणियां कर रखी है जिन्हें सिर्फ उनका कृपा पात्र ही समझ सकता है।
।।धर्मराय(काल ब्रह्म)वचन।।
हे साहेब तुम पंथ चलाओ,जीव उबार लोक ले जाओ।
पंथ एक तुम आप चलाओ, जीवन लै सतलोक पठाओ।।
कहा तुम्हारा जीव नहीं माने,हमारी ओर होय बाद बखाने ।।
काल कहता है कि मेरा पक्ष लेकर तुम्हारे साथ बाद विवाद किया करेंगे।
कबीर साहेब जी ने आगे कहा है।
सम्वत् सत्रा सौ पचहतर होई,ता दिन प्रेम प्रकटे जग सोई।।
यानि मेरी वाणी सम्वत् १५७५ में पुन: प्रकट होगी।
संत गरीब दास को १०वर्ष की उम्र में ही परमात्मा कबीर साहेब जी ने साधु रुप मे दर्शन देकर अपने साथ लेकर सतलोक ले गए। सतलोक तक सभी लोको की व्यवस्था (स्थिती)दिखा कर पुन: वापिस छोड़ा । परिवार वालों ने मरा हुआ समझ कर दाह संस्कार की तैयारी कर ली ।लेकिन चिता को अग्नि देने से पहले ही उठ खड़े हो गए।
जैसे उठे उन्होने कबीर वाणी बोलना शुरु कर दिया।
"अलल पंख अनुराग है,सुन्न मण्डल रहै थीर।
दास गरीब उदारिया,सतगुरु मिले कबीर।।"
कबीर परमात्मा ने अपनी अमृत वाणियां गरीब दास जी के माध्यम से प्रकट करवा के उन्हें लिपीवद्ध किया गया।जोकि इस समय संत रामपाल जी महाराज के पास ग्र्ंथ रुप में आश्रम में मौजूद है।
परम् पूज्य संत रामपाल जी महाराज संत गरीब दास जी की सतगुरु प्रणाली से आते हैं।
मार्च १९९७ में फाल्गुन शुक्ल एकम संवत् २०५४को दिन के दस बजे परमेशवर कबीर साहेब जी वास्तविक रुप में संत रामपाल जी महाराज को मिले तथा कहा कि चिंता मत कर, मैं तेरे साथ हुँ।अब सारनाम तथा सार शब्द प्रदान करने का समय आ गया है।
इसलिए अन्य नकली काल के पंथों से मोक्ष नहीं हो सकता।
राधास्वामी के मुखिया (परवर्तक)शिवदयालसिंह की मुक्ति नहीं हुई तो अन्य शिष्यों का क्या हाल होगा मृत्यु उपरान्त वे अपनी शिष्य बुक्की मे प्रेत की तरह प्रवेश कर गए थे।उसके बाद बुक्की हुक्का पीने लगी चुरमा लेने तथा पलंग बिछाने लगी उसकी आंखे सुर्ख अंगारा सी हो जाती थी।यदि कोई बात पूछनी होती तो बुक्की के जरिए शिवदयालसिंह से पूछ लिया करते थे ।अधिक जानकारी के लिए पढ़े।जीवन चरित्र स्वामीजी महाराज-लेखक प्रताप सिंह।
स्वामीजी महाराज अंतिम समय तक बुक्की के शरीर में प्रकट रहे।
बुक्की स्वामीजी के पैर का अंगुठा मुंह में रख कर चूसा करती थी।जब कोई मत्था टेकने के वास्ते हटाना चाहता तो वे चरण नहीं छोड़ना चाहती थी।तब मत्था टेकने वाले से कह दिया जाता इस प्यासी को मत हटाओ तुम दुसरे चरण पर मथा टेक लो।और बयान किया करती थी कि मुझे इसमें ऐसा रस आता है कि जैसे कोई दूध पीता है।
श्री शिवदयालसिंह का कोई गुरु नहीं था।उन्होने 17वर्ष तक कोठरीे में बंद रह कर हठयोग किया।वह हुक्का भी पीते थे।
जिसके बारे में कबीर साहेब जी कहते हैं।
"गुरु बिन माला फेरते ,गुरु बिन देते दान।
ये दोनों निष्फल है,चाहे पुछो वेद पुरान।।"
गरीब,हुक्का हरदम पिवते,लाल मिलावै धूर। इसमें संशय है नहीं,जन्म पिछले सूर (pig)।।
गरीब,सौ नारी जारी करै,सुरा पान सौ बार।एक चिलम हुक्का भरै,डुबे काली धार।।
सावन सिंह महाराज के शिष्य खेमामल शाह मसताना डेरा सच्चासौदा के संस्थापक ने अपनी किताब में लिखा है कि सावनसिंह महाराज ने 12 साल तक मेरे शरीर में बैठ कर काम किया लेकिन किसी ने नहीं समझा अब मैं सतनाम सिंह के शरीर मे बैठकर नाम दूंगा।इससे सिद्ध होता हैकि अभी तो ये जीवन मरण के चक्कर में फसे हैं मुक्ति कहां से हुई।
श्रीमद्भगवत गीता अ०15श०4 में प्रमाण है सत्य साधना करने वाले साधक, परमेश्वर के उस परम धाम को प्राप्त हो जाते हैं,जहां जाने के पश्चात फिर लौटकर कभी संसार में नहीं आते।
यदि राधास्वामी के पास परमात्मा होते तो गद्दी न मिलने के कारण इतनी शाखाएं नहीं बनती।इस समय राधास्वामी की नौ से ज्यादा शाखाएं चल रही है।और पानी उसी एक कुएं का है।राधास्वामी वाले वाणियां तो कबीर साहेब की लेते है लेकिन उन्हे कवि और संत कह कर किनारा कर लेते है। मैं कहता हुँ यदि राधास्वामी वालो के पास इतना ज्ञान है तो अपनी किताबों में से कबीर साहेब जी ,दादू साहेब, पलटू साहेब,मलूक दास आदि की वाणियां अलग कर लो, क्योंकि इन सबके गुरु कबीर साहेब थे।तो फिर तुम्हारे पास क्या ज्ञान बचेगा? क्या राधास्वामी से पहले इस पृथ्वी पर परमात्मा नही थे?
सच तो यह है परमात्मा चारों युगों मे आते हैं और जीव को काल के बन्धन से छुड़ा कर सतलोक ले जाते हैं।
"सतयुग सतसुकृत कह टेरा,त्रेता नाम मुनिद्र मेरा।
द्वापर मे करुणामय कहाया,कलियुग नाम कबीर धराया।।
चारों युग संत पुकारे,कूक कहा हम हेल रे।
हीरे माणिक मोती बरसे,यह जग चुगता ढेल रे।।"
राधास्वामी वालो, जो किसी के कर्म नहीं काट सकता वह सतगुरु और परमात्मा कैसा? जबकि वेदों मे लिखा है, परमात्मा पापी के पाप नाश करके आयु भी बढ़ा देता है।राधास्वामी वाले तो ज्ञान को सुनना भी नहीं चाहते जब तक सुनोगे नहीं तो तुलना कैसे करोगे कि कौन सही है कौन गलत। यदि कोई व्यक्ति कह रहा है तो उसकी बातों पर ध्यान दो और उसका विशलेषण करो।समझदारी उसी को कहते हैं अन्यथा भेड़चाल तो सभी करते हैं।विस्तृत जानकारी के लिए "ज्ञान गंगा"पुस्तक पढ़े।
।। सत् साहेब ।।

रविवार, 12 जुलाई 2015

कड़वा सत्य द्रोपदी का चीर हरण

।। कड़वा सत्य = द्रोपदी का चीर हरण ।। 

महाभारत में एक प्रकरण आता है:- जिस समय द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था। उस समय भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा करण इन सबकी दुर्याेधन राजा द्वारा विशेष आवाभगत की जाती थी, इसी कारण से राजनीति दोष से ग्रस्त होकर अपने कर्तव्य को भूल गए थे। पाण्डव अपनी बेवकूफी के कारण राजनीति के षड़यंत्र के शिकार होकर विवश हो गए थे। उस सभा (पंचायत) में एक धर्मनीतिज्ञ पंचायती विदुर जी थे। उसने स्पष्ट कहा। आदरणीय गरीबदास जी की वाणी में:-
विदुर कह यह बन्धु थारा, एकै कुल एकै परिवारा। दुर्याेधन न जुल्म कमावै, क्षत्रीय अबला का रक्षक कहावै।
अपनी इज्जत आप उतारै, तेरी निन्द हो जग में सारै। विदुर के मुख पर लगा थपेड़ा, तू तो है पाण्डवों का चेरा (चमचा)।
तू तो है बान्दी का जाया, भीष्म, द्रोण करण मुसकाया। भावार्थः- उस पंचायत में केवल धर्मनीतिज्ञ पंचायती भक्त विदुर जी थे। निष्पक्ष वचन कहे कि हे दुर्योधन! कुछ विचार कर आपके कुल की बहू (द्रोपदी) को नंगा करके आप अपनी बेइज्जती आप ही कर रहे हो। क्षत्रीय धर्म को भी भूल गए हो, क्षत्रीय तो स्त्री का रक्षक होता है। बुद्धि भ्रष्ट अभिमानी दुर्योधन ने पंचायती की धर्मनीति को न मानकर उल्टा अपने भाई दुशासन से कहा कि इस विदुर को थप्पड़ मार। दुशासन ने ऐसा ही किया तथा कहा कि तू तो सदा पाण्डवों के पक्ष में ही बोलता रहता है, तू तो इनका चमचा है। अहंकारी दुर्योधन ने राजनीतिवश होकर अपने चाचा विदुर को भी थप्पड़ मारने की राय दे दी। विदुर धर्मनीतिज्ञ पंचायती सभा छोड़कर चला गया। पंचायती का यह कर्तव्य होना चाहिए। सत्य कह, नहीं माने तो सभा छोड़कर चला जाना चाहिए। परंतु उस सभा में द्रोपदी को नंगा किया जा रहा था। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, करण फिर भी विद्यमान रहे। उनका उद्देश्य क्या था? स्पष्ट है उनमें महादोष था, वे भी स्त्री का गुप्तांग देखने के इच्छुक थे। सज्जनों! यदि इन तीनों (भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा करण) में से एक भी खड़ा होकर कह देता कि खबरदार अगर किसी ने ‘‘स्त्री‘‘ के चीर को हाथ लगाया। ये तीनों इतने योद्धा थे कि उनमें से एक से भी टकराने की हिम्मत किसी में नहीं थी। भीष्म दादाजी थे, प्रथम तो उसका कर्तव्य था, कहता कि दुर्योधन! द्रोपदी का चीर हरण मत कर, तुम भाई-भाई जो करना है करो। दूसरे कहना था कि हे अपराधी दुशासन! अपने चाचा पर हाथ उठा दिया तो समझो अपने पिता पर हाथ उठा दिया, उसको धमकाना चाहिए था। लेकिन राजनीति के कायल किसी ने भी पंचायती फर्ज अदा नहीं किया। उसी कारण से महाभारत के युद्ध में सर्व दुर्गति को प्राप्त हुए। केवल विदुर ही धर्मात्मा था जो अच्छा पंचायती था

मंगलवार, 30 जून 2015

एक महत्वपूर्ण प्रसंग...


जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जीमहाराज जी के अमृत सत्संगों से एक महत्वपूर्णप्रसंग...

सत् साहिब जी भक्त आत्माओं..
600 साल पहले जब परमेश्वर कबीर साहिब
जी काशी में आये थे तो अपना अनमोल
तत्व ज्ञान जन-जन में प्रचारित करते थे और हमें समझाया
करते थे और कहते थे कि आपको जो ये ज्ञान मार्गदर्शक
(नकली धर्मगुरु) मिले हुए है ये सब अधूरे ज्ञान
पर आधारित है। ये सब आपको गुमराह कर रहे है। लेकिन इन
नकली धर्मगुरुओं ने काल प्रेरणा से अपने स्वार्थवश
हमें अपने परमात्मा का ही दुश्मन बना दिया। परमात्मा
का घोर विरोध करवा दिया। क्योंकि उस समय जनता अशिक्षित
थी। इसी बात का लाभ यह
नकली धर्मगुरु उठाते रहे और हमें अपने परमात्मा
से दूर रखे रखा। जब परमात्मा अपने ज्ञान का प्रचार कहते थे
तब हिन्दू और मुसलमान दोनों को समझाया करते थे कि जो साधना
तुम कह रहे हो वह साधना तुम्हारी
ठीक नहीं है। आप सब शास्त्रविधि को
त्यागकर मनमानी पूजाएँ कर रहे हो इन साधनाओं से
न तो आपको कोई सुख होगा और न ही कोई गति
होगी। ये आपकी
गीताजी बता रही है। लेकिन
वह नकली स्वार्थी लोग इस बात को ऊपर
नहीं आने देते थे। वह जनता को अपने शिक्षित
होने का एवं परमेश्वर कबीर साहिब जी
के अशिक्षित होने का हवाला देकर भ्रमित करते रहते थे।
परमात्मा उस समय उन भोली जनता को समझाया करते
थे कि ये जो मार्गदर्शक आपके है ये ठीक
नहीं है और उन श्रषियों ब्राह्मणों
काजी मुल्लाओं को भी अपने बच्चे
समझकर कहते थे...
"मेण्डी जिन्दडिये उस रब दा पंथ विखट है बाट,
मेण्डी जिन्दडिये उस रब दा पंथ विखम है बाट।
वह परमात्मा जिसका वर्णन आपके पवित्र सद्ग्रन्थों में है वह
बहुत ही विकट है। क्योंकि उस परमपिता
की जानकारी एवं उसकी भक्ति
विधि का ज्ञान किसी को भी
नहीं है। इसी प्रकार
गीताजी वेद कुराण बोलने वाला भगवान
भी कह रहा है कि मैं भी
नहीं जानता उस परमपिता के विषय में,
उसकी जानकारी तो किसी
तत्वदर्शी सन्त से पूछों। उसके बिना मुक्ति
नहीं है।
परमेश्वर कबीर साहिब जी
काजी मुल्लाओं पंडितों को समझाते हुए रहे है कि...
गरीब, गगन मण्डल में महल साहिब का, अन्दर
बण्या झरोखा,
एक मुल्ला मस्जिद में कूके, एक पुकारे बोका(बकरे की
दर्दभरी आवाज)
गरीब, एक मुल्ला मस्जिद में कूके, एक पुकारे बोका,
इनमें कौन सरे(स्वर्ग) कूं जायेगा, हमकूं लग्या है धोखा।
"गरीब, मोहम्मद ने कद मस्जिद पूजी,
बाजीद ईद कद खादी,
सुल्तानी कद पानी पूजैं, छाड़ तख्त गए
गादी॥
गरीब, कलमा रोजा बंक निवाजा, कद नबी
मोहम्मद कीन्हया,
कद मोहम्मद ने मुर्गी मारी, कर्द गले
कद दीन्हया॥"
यहाँ परमात्मा कह रहे कि कब मोहम्मद साहिब
जी ने मस्जिद पूजी, कब
बाजीद जी ने ईद मनाई, कब मोहम्मद
जी ने कलमा रोजा बंग पढ़ा और कब मोहम्मद
जी ने मुर्गी मारी.?
नबी हजरत मोहम्मद जी ने
कभी भी ऐसा जुल्म करने की
सलाह नहीं दी फिर क्यों तुम परमात्मा के
निरीह जीवों को मारते हो। एक तरफ तो
आप इन सब महापुरुषों की दुहाई देते हो और
दूसरी तरफ आप सारी क्रियायें इनके
विपरीत करते हो.?
खण्ड़ पिण्ड़ ब्रह्मण्ड़ न होते, ना थे गाय कसाई,
आदम हव्वा न हूजरा होते, कलमा बंग ना भाई॥
एक बार काशी में काजी मुल्लाओं के
कहने पर दिल्ली के बादशाह सिकन्दर
लोधी ने कबीर साहिब जी
की परीक्षा लेने के लिए एक ग्याभन गाय
को काट दिया और कहा कि यदि तुम अल्लाह हो तो इस गाय को
जीवित करके दिखाओ।
परमेश्वर कबीर साहिब जी खड़े हुए
और दिल्ली के बादशाह एवं हजारों लोगों के सामने उस
मरी हुई ग्याभन गाय को बच्चे सहित
जीवित कर अपनी सर्मथता दिखाई और
कहा कि...
"हम ही अलख अल्लाह है, कुतुब गोस और
पीर,
गरीबदास खालिक धनी, हमरा नाम
कबीर"।
"मैं कबीर सरबंग हुं, सकल हमारी जात,
गरीबदास पिण्ड़ प्राण में, जुगन-जुगन का साथ"।
फिर परमात्मा ने वहाँ हिन्दू और मुसलमानों को ढेढ़ घण्टे तक
प्रवचन दिए और कहाँ कि आप सब एक पिता की
संतान हो, तुम सब मेरे ही बच्चे हो। काल ने आपको
भ्रमित कर उस परमपिता से दूर कर रखा है...
सन्त गरीबदास जी महाराज ने
अपनी अमृतवाणी में परमेश्वर
की वार्ता को बहुत सुन्दर रुप से वर्णन किया है....
"गरीब, काशी जौरा दीन का,
काजी खिलस करन्त,
गरीबदास उस सरे में, झगड़े आन पड़न्त।
गरीब, सुन काजी राजी
नहीं, आपै अलह खुदा,
गरीबदास किस हुकुम से, तूने पकड़
पछाड़ी गाय।"
परमात्मा ने कहा कि किसके आदेश से यह गाय तुमने मार
दी। यह भगवान का प्राणी है तुम्हें
मारने का कोई अधिकार नहीं है।
फिर परमात्मा ने कहा कि...
"गऊँ आपनी अम्मा है, इस पर छुरी मत
बाह,
गरीबदास घी दूध को, सबही
आतम खाय।"
यह गाय सबकी मां है। जो दूध पिलाती
है वह मां कहलाती है।
जिस ममडी का दूध पीवत हो, धृत
(घी) दूध बहु खाई,
उसका फिर तुम कतल करत हो, लेकर करद कसाई।
परमात्मा ने कहा कि जिस माँ का तुम दूध पीते हो,
घी खाते हो और फिर उसी को तुम काट
रहे हो कहाँ गई आपकी बुद्धि...
"गऊँ तुम्हारी माता है, पीवत जिसका दूध,
गरीबदास काजी कुटिल, तेने कतल किया
औझूद।"
परमात्मा ने काजी मुल्लाओं को समझाते हुए कहा
कि...
"ऐसा खाना खाईये, माता के ना हो पीर,
गरीबदास दरगह सरे, तेरे गल में पड़े
जंजीर"।
परमात्मा ने कहा कि ऐसा खाना खाओ जिससे माता के
पीड़ा ना हो।
गरीब, मुर्गे से मुल्ला भये, मुल्ले से फिर मुर्ग,
गरीबदास दोजख धसै, तुमने पावैं नहीं
स्वर्ग।
आज तुम मुर्गे को मार रहे हो कल फिर मुर्गा तुम्हें मारेगा। यह
अदला बदला ऐसे ही चलता रहेगा जब तक कि तुम्हें
यह तत्व ज्ञान बताने वाला सदगुरु नहीं मिलेगा।
परमात्मा कहते है कि...
"बदला कहीं न जात है, तीन लोक के
माय,
और सदगुरु मिले कबीर से तो सतलोक ले जाय"।
काजी कलमा पढ़त है, बाँचे फेर कुरान,
गरीबदास इस जुलम से, तेरे डूबे दोनो जिंहान।
पहले काजी बकरे पर कलमा पढ़कर उसे हलाल
करता है फिर पीछे कुरान का पाठ पढ़ता है, परमात्मा ने
कहा कि ऐसे जुल्म से तो तुम नरक के भागी बनोगे।
गरीब, दोनों दीन दया करो, मानो वचन हमार,
गरीबदास सूर गऊँ में, एकहि बोलनहार।
सूर गऊँ में जीव एक है, गाय भखो ना सूर,
गरीबदास सूर गऊँ में, दोहूं का एकहि नूर।
परमात्मा ने कहा कि सूर और गऊँ दोनों में एक जैसा
ही जीव है। एक जैसा ही
दर्द होता है इसलिए किसी भी
जीव को मत मारो। जीव हिंसा मत करो।
हिन्दू झटके मार ही, काजी करै हलाल,
गरीबदास दोनों दीन का, तुम्हरा होगा हाल
बेहाल।
सुन मुल्ला मरदूद तू, कुफर करै दिन रात,
गरीबदास हक बोलता, और मारै जीव
अनाथ।
"हक हलाल पिछान पति कर दूर रे, या मुर्गी रब रुह
गऊ क्या सूर रे"
रमजानी रमजान क्या सोच जां दिया, या पकड़
पछाड़ी रूह कहों यो क्या किया..??
परमात्मा ने कहा कि दिन में तो तुम भूखे मरें रोजा रखा और शाम को
मुर्गा मार कर खा लिया...ये क्या भक्ति हुई भई..??
खूनी खून उजार खाल क्यों काढ़ता,
वो देखे रब रहमान गले क्यों बाढ़ता।
परमात्मा के जीवों को क्यों काट रहे हो, वह परमात्मा
सब देख रहा है।
मुसलमान कूं गाय भखी, हिन्दू खाया सूर,
गरीबदास तुम दोनवो से, राम रहीमा दूर।
ब्राह्मण हिन्दू देव है, और मुल्ला मुसल का पीर,
गरीबदास उस स्वर्ग में, तुम दोनों को हो
तकसीर।
काजी पढ़ै कुरान कूं, मुझे अंदेशा ओर,
गरीबदास उस स्वर्ग/दरबार में, नहीं
खूनी को ठौर।
सुन मुल्ला तू मिलेगा, उस नरक के माहीं,
गरीबदास लख अर्ज करियो, मुल्ला छूटैं
नाहीं।'
लाख अर्ज मुल्ला करियो, चाहे काजी करियो करोड़,
गरीबदास वहाँ कोई नहीं
संगी, मत झोटे बकरे तोड़।
गरीब, मुर्गे सिर कलंगी होती,
चिसमें लाल चलूल,
गरीबदास उस कलंगी का, कहाँ गया वो
फूल।
परमात्मा ने कितना सुन्दर मुर्गा बना रखा है, कितनी
सुन्दर उसके सिर पर कलंगी ला रही
थी और तुमने उसे काट-पीट कर कण्डम
कर दिया, उसे बिगाड़ दिया।
सुन मुल्ला माली अलह, ये फूल रुप संसार,
गरीबदास गति एक सब, पान फूल फल डार।
परमात्मा काजी मुल्लाओं को समझाते हुए कह रहे
है कि जैसे माली एक बगीचा लगाता है
वैसे ही यह पूरा संसार एक माली
(परमात्मा) का बाग है और उसने बड़े प्यार से इसे
सींचा हुआ है। जब माली का कोई एक
फल, एक टहनी या एक पौधा भी कोई तोड़
लेता है तो उस माली को बहुत दुख होता है वह
उस व्यक्ति से प्यार नहीं करता। उसी
प्रकार तुमने एक मुर्गा भी उस मालिक का मार दिया तो
तुम्हारी खैर नहीं है।
फिर परमात्मा ने बताया कि ये खाना खाया करो...
"बासमती चावल पकै, घृत खांड टूक डार,
गरीबदास करो बन्दगी, ये कूढ़े काम निवार"।
"फुलके धोवा डाल कर, हलवा मिठी खा,
गरीबदास काजी सुन ये, माँस
मिट्टी मत खा"।
गरीब, मुल्ला से पंडित भये, पंडित से भये मुल्ल,
गरीबदास तज् बैर भाव, तुम करलो सुल्लम सुल्ल।
परमात्मा ने कहा कि द्वापर से पहले कोई पंथ मजहब
नहीं था इसलिए आपके संस्कार आपस में मिले-जुले
है। आज कोई मुल्ला है वह अगले जन्म में पंडित
भी हो सकता है और जो आज पंडित है वह अगले
जन्म में मुल्ला भी बन सकता है इसलिए
अभी से तुम अपना प्यार बना लो, बैर भाव त्याग दो,
बुराइयाँ छोड़ दो और एक परमात्मा की भक्ति कर लो।
गरीब काजी खिलस उठाय ले, तज् रोजे
की रीत,
गरीबदास अल्लाह भजो, यों समय जावेगा
बीत।
परमात्मा ने कहा कि ये गलत साधनाएं त्याग दो और उस एक
अल्लाह/परमात्मा की भक्ति करो अन्यथा यह
मनुष्य जीवन का अनमोल समय हाथ से निकल
जायेगा।
"हिन्दू मुसलमान के बीच में, मेरा नाम
कबीर,
आत्म उद्धार कारणै, अविगत धरा शरीर"॥
सत् साहिब जी।
परमेश्वर बन्दीछोड़ सदगुरु रामपाल जी
महाराज की सदैव जय हो ! 

रविवार, 28 जून 2015

श्री हनुमानबोध

           श्री हनुमानबोध 

कबीर सागर के अध्याय "बोध सागर" में 'श्री हनुमानबोध' में हनुमानजी और मुनीन्द्र श्रषि (कबीर परमेश्वर जी) की चर्चा का वर्णन है। कबीर साहिब जी ने धर्मदास जी को कहा कि मैं त्रेतायुग में हनुमान जी से आकर मिला, उन्हें तत्वज्ञान समझाया फिर सतलोक दिखाया तब हनुमान जी को पूर्ण विश्वास हुआ उसने मुझसे नाम उपदेश लेकर अपना कल्याण करवाया।
धर्मदास जी ने मुनीन्द्र श्रषि(परमेश्वर कबीर साहिब जी) और हनुमानजी की चर्चा को कबीर सागर में लिपिबद्ध किया।
कबीर साहिब जी ने हनुमान जी को अपनी शरण में लेने की कथा धर्मदास जी को सुनायी।
"कहै कबीर धर्मदास समझाई, त्रेतायुग में हनुमान चेताई,
सेतुबन्ध रामेश्‍वर हम गए, नाम मुनीन्द्र से हम जाने गए"
कहै मुनीन्द्र सुनो हनुमान, तुमको अगम सुनाऊँ ज्ञान,
मन में आपके जो अभिमान, तज अभिमान सुनो तुम ज्ञान,
सतपुरुष की कथा सुनाऊँ, अगम अपार भेद समझाऊँ,
सतसुकृत की कथा यह भाई, मर्म समझ नहीं आया आपकी,
सतपुरुष की कथा अपार, उसपर तुमही करो विचार,
उसकी गति तुम समझ ना पाये, पूर्ण पुरुष जो सब में समाये,
किसकी सेवा करते भाई, वह सब मुझे कहो समझाई,
रामचन्द्र तो है अवतार, प्रलय में जाये हर बार।
"तीन लोक में निरंजन तुम, जिनके गुण गावौं,
वह समर्थ कोई ओर है, उसको जान न पावौं"
परमात्मा ने कहा कि इन तीनों लोको में निरंजन तक का ही गुणगान होता है, उससे ऊपर पूर्ण प्रभु/सतपुरुष को कोई नहीं जानता जिसने सब ब्रह्माण्ड बनाया।
(तब हनुमान जी ने कहा)...
"सुनो मुनीन्द्र ढृढ़ कर ज्ञान, तब तो भेद हुआ निरबान,
सतपुरुष का भेद बताओ, हमसे कुछ भी नहीं छुपाओ।
(तब मुनीन्द्र श्रषि जी ने हनुमान जी कहा)...
हे हनुमान सुनो मेरा ज्ञान, तुम्हें बताऊँ भेद विधान,
सतपुरुष/समर्थ का भेद बताऊँ, तुमसे कुछ भी नहीं छुपाऊँ।
आदि अनादि पार से भी पार, उसका अगम में सुनो विचार,
जो विश्वास जीव में होता, सतशब्द की छाया पाता,
समर्थ की शरण है बड़ी प्यारी, वहाँ बल पौरुष सुख है भारी,
तादिन की यह कथा सुनाऊँ, जो मानो तो कहि समझाऊँ,
समझ करो अपने मन माहीं, अकथ है वह कहने की नाहीं,
क्या विश्वास करे कोई भाई, देखी सुनी ना वेदो ने गाईं,
जो संदेश मेरा नहीं मानै, हंस गति को वो नहीं जानै,
तभी तो कष्ट सहे भवसागर, जो ना मानैं दुःख पावै नर,
सतशब्द मैं कहूं बखान, समझौ तो ये बूझो ज्ञान,
"समझ करौ हनुमान तुम, तुम हो हंस स्वरूप,
राम-राम क्या करते हो, पड़े अंधेरे कूप"
"राम-राम तुम कहते हो, नहीं वे अकथ स्वरूप,
वे तो आये जगत में, हुए दशरथ घर भूप"
"अगम अथाह तुमसे कहुँ, सुन लो अगम विचार,
ना वहाँ प्रलय उत्पत्ति, वहीं समरथ सृजनहार"
(मुनीन्द्र श्रषि जी ने हनुमानजी को आदि सृष्टि का ज्ञान दिया)...
सुनो हनुमान कथा यह न्यारी, तब नहीं थी कोई आदि कुमारी,
जिससे हुआ है सकल विस्तार, वह नहीं थी तब रचानाकार,
आदि भवानी जो महामाया, उसकी नहीं बनी थी काया,
नहीं निरंजन की उत्पत्ति कीन्हा, समर्थ का घर कोई न चीन्हा"
तब नहीं ब्रह्मा विष्णु महेष, अगम जगह समर्थ का देश,
तब नहीं चन्द्र सूर्य और तारा, तब नहीं अंध कूप उजियारा,
तब नहीं पर्वत और ना पानी, समर्थ की गति किसी ने ना जानी,
तब नहीं धरती पवन आकाश, तब नहीं सात समुन्द्र प्रकाश,
पाँच तत्व गुण तीन नहीं थे, यहाँ तहाँ पर कुछ भी नहीं थे,
दश दिगपाल नहीं थे लेखा, गम्य अगम्य किसी ने ना देखा,
दशों दिशा की रचना नहीं थी, वेद पुराण व गीता नहीं थी,
मूल डाल वृक्ष न छाया, उत्पत्ति प्रलय नहीं थी माया,
तब समर्थ था आप अकेला, धर्म माया ना मन का मेला,
बिन सतगुरु कौन ये बतावै, भूली राह कौन समझावै,
"हनुमत यह सब बूझ कर, कर लो अपना काज,
निर्भय पद को पाकर तुम, होगा अभय सब राज"
(तब हनुमान जी ने कहा)...
सुनो मुनीन्द्र वचन हमारा, हम नहीं समझे भेद तुम्हारा,
कहो विश्वास कौन विधि आये, कैसे मन विश्वास जमायै,
कैसे इस विश्वास को पावैं, तब हम मन वामे लगावैं,
जहाँ समर्थ वहीं पर हम जावैं, तब मन में विश्वास जमावैं,
वहाँ पहुँचकर वापस आऊँ, तब सच्चा विश्वास मैं पाऊँ,
जो तुमने सब सत्य कहा है, मेरे देखने की ईच्छा है,
फिर मैं आपकी शरण में आऊँ, बार-बार फिर शीश नवाऊँ,
सब कुछ तुम दिखाओ मुझको, झूठा नहीं समझूं फिर तुमको,
"सुनो मुनीन्द्र बिन देखे, नहीं विश्वास मैं पाऊँ,
आदि सृष्टि की कहते हो, वहाँ कौन विधि जाऊँ"
(तब मुनीन्द्र श्रषि जी ने हनुमान जी के बार-बार विनय करने पर सतलोक के दर्शन कराये)...
जब ऐसे बोले हनुमान, उठे मुनीन्द्र मन में जान,
उठते देखा फिर देखा नहीं, हुए विदेह मुनीन्द्र तब वहीं,
पवन रूप में गए आकाश, बैठे पुरुष विदेही पास,
चहुँदिशि देखे हनुमत वीर, किस प्रकार का हुआ शरीर,
साथ चले धरती पग धारी, परम प्राण वहाँ लगी खुमारी,
देखा चन्द्र वरण उजियार, अमृत फल का करै आहार,
असंख्य भानु जैसे पुरुष छवि थी, करोड़ों भानसी रोम-रोम थी,
चारों दिशाओं में नजर घुमा रहे, हार गये जब बता ना पा रहे,
तब हनुमत ने वचन कहै भारी, तुम हो मुनीन्द्र अति सुखकारी,
प्रकट होकर दर्शन दीजै, मेरे हृदय का दुख हर लीजै,
"धर के देह मुनीन्द्र तब, आये हनुमत पास,
वरण वेष कुछ ओर था, सत्य पुरुष प्रकाश"
(जब हनुमान जी ने सतलोक में मुनीन्द्र श्रषि को नूरी विदेह रूप में सतपुरुष के सिंधासन पर विराजमान देखा तब वह जान गए कि यहीं परमात्मा है तब उन्होंने प्रार्थना कि हे परमात्मा मुझे पुनः दर्शन दीजिए तब परमात्मा नूरी देह धरकर मुनीन्द्र रूप में आकर दर्शन दिए)
तब हनुमान सत्य कर मानी, तुम मुनीन्द्र सत्य हो ज्ञानी,
अब तुम मुझको पुरुष दिखाओ, मेरे मन विश्वास जमाओ,
अगली कथा कहौ तुम मुझसे, अपना नाम बताओ हमसे,
कौन विधी से समर्थ को जान, मुझे सुनाओ ये सब ज्ञान,
वचन तुम्हारा है प्रमाण, समर्थ का है कौन स्थान,
अपने गुरु(निजगुरु) का ज्ञान मोहे दीजै, अपना दास मुझे भी कर लीजै,
"समर्थ के स्थान को, अब तुम दो बताय,
किस दुनिया में रहता वो, कहौ मुझे समझाय"
(तब मुनीन्द्र श्रषि जी ने कहा)...
कर विश्वास मानो हनुमान, बल पोरुष मेरा गह जान,
ना जानै तो ओर जनाऊँ, समर्थ का स्थान बताऊँ,
योगजीत मैं नाम कहाऊँ, ज्ञानी होकर जग में आऊँ,
दोनों नाम लोक के भाई, देह में जग को देता दिखाई।
((मुनीन्द्र श्रषि ने अपना भेद छुपाते हुए हनुमान जी को "सृष्टि रचना" सुनाई))...
[उस दिन का मैं कहूँ संदेश, जब मैं था समर्थ के देश,
एक बार की सुनो हमारी, समर्थ की गति कहूँ विचारी,
पहले हुए निरंजन राया, पुरुष ध्यान कर उपजाया,
फिर पैदा हुई शक्ति भवानी, मैरा नाम रखा तब ज्ञानी,
ये तो कथा है बहुत अपार, अपने मन में लियो विचार,
संक्षेप कुछ सुनाऊँ तुमको, निश्चय कर मानो तुम हमको,
महामाया समर्थ से आयी, धर्मनि निगल लई वह भाई,
तब कन्या ने करी पुकार, समर्थ मुझको लेना उबार,
हुक्म दिया तब प्रभु ने मुझको, योगजीत तुम उबारो उसको,
धर्मराय के सिर को फोड़ो, महाशक्ति का बधंन तोड़ो,
महाशक्ति का बंध छुड़ावो, धर्मराय का शीश उड़ावो,
तबही तुंरत वहाँ में आया, काटा शीश निकाली महामाया,
मैंने धर्म का शीश उड़ाया, महामाया को तभी बचाया,
दया का भाव मेरे मन आया, अमृत से फिर धर्म जिवाया,
धर्मराय समर्थ के चोर, सेवा कर किया उपकार घोर,
जब से निंगली है महामाया, काल नाम धर्मराय कहाया,
दोनों मिले ब्रह्म वा माया, तीनों लोकों को उपजाया,
तीनों पुत्रों को तब पाया, तीनों ने यह जग उपजाया,
ब्रह्मा विष्णु महेष बखानै, जिनको सारी दुनिया जानै,
समर्थ को वह कैसे पावैं, जिसको तीनों देव भरमावे!!!]
(मुनीन्द्र श्रषि ज्ञान समझाते हुए कह रहे है)...
"यह समर्थ की भक्ति है, सुनो ज्ञान की रीत,
योग युक्त निज समझाऊं, करना निज से प्रीत"
अब तुम ज्ञान सुनो हनुमान, समर्थ का है निर्मल ज्ञान,
निराधार आधार ना कोही, जो साधु वहाँ पहुंचे वोही,
निर्गुण सगुण ध्यान कर पावैं, वहाँ ना सगुण निरंजन आवै,
अनुभवी वाणी करै प्रकाश, वहीं साधु है श्वांस-उश्वांस,
महाकठिन तलवार की धार, ऐसा निर्गुण ज्ञान हमार,
निर्गुण-सगुण ना दोनों कोई, हंस नाम की छाया वोही,
तीनों गुणों से सगुण कहाता, चौथा गुण निर्गुण ही होता,
निर्गुण सगुण दोउ के पार, शब्द श्वांस वहाँ ना ओंमकार,
अदभुत ज्ञान विकट है भाई, ऐसी राह किसी बिरले ने पाई,
बिना ज्ञान के ना मुक्ति होई, कोटिक लिखै पढ़ै चाहे कोई,
"भक्ति ज्ञान तुमसे कहा, सुन लो योग अपार,
रोम-रोम के गुण कहुँ, काया का विस्तार"
(तब मुनीन्द्र ऋषि जी ने हनुमान जी को काया का भेद बताया....)
काया है प्रभु/समर्थ की दी भाई, इसकी गति किसी ना पाई,
शिव गोरख ने योग कमाया, पर काया का भेद न पाया,
कौन गुणों से खड़ी ये काया, कौन है सुरति कौन है माया,
कुंज गली सुनो हनुमान, कोई सका ना निज भेद जान,
मैं ही भेद बताऊं तुमको, सुन कर मन में समझो इसको,
बड़े-बड़े गए इससे हार, यह विधि भेद है अगम अपार,
समरथ सागर समरथ वास, उससे पैदा समरथ श्वांस,
श्वांस के भीतर बोले वाणी, ढरके अमृत बूंद जो जानी,
उसी बीज से अकुंर फूटा, काया कारण है सब पूरा,
धर्मराय ने बीज वो पाया, एक शक्ति संग जामन लाया,
वह शक्ति है रक्त की मूल, उसी से बीज हुआ स्थूल,
काया की गति अगम अपार, हनुमंत इसका करो विचार,
तीन लोक को तुम सब जानो, सब काया के भीतर मानो,
उस काया का करो विचार, हनुमंत मन में करो निरधार,
आठ चक्र है कमल है आठ, बंधन लगे तीन सौ सांठ,
नौ नाडी है कोठे बहत्तर, कोठे सौ उस गुफा के अन्दर,
शक्तिशाली दस दरवाजे, पाँच तत्व गुण तीनों साजे,
चन्द्र सूर्य चमके है भीतर, ईंगला पिंगला सुष्मना अंदर,
सात समुन्दर काया भीतर, नौ सौ नदियाँ बहे यहाँ पर,
दशौं दिशा काया के भीतर, सभी देव रहे इसके अंदर,
यही काया विराट स्वरूप, ज्योति रूप रहे इसमें भूप,
रहे निरंजन भीतर काया, ओमकार माया की छाया,
रंरकार गरजे ब्रह्माण्ड़, सात द्वीप प्रकटे नौ खण्ड़,
समर्थ अंश बसे इस भीतर, घर में बसे एक वस्तु स्थिर,
उसे कोई पहचान न पाया, तभी तो सब जग मरता आया,
"काया के गुण अगम है, सुन लो हनुमंत वीर,
कोई देख नहीं पाता, अदभुत रचा शरीर"
(तब हनुमान जी कहा)...
हे स्वामी मैंने सब जानी, तुम ही समर्थ तुम ही ज्ञानी,
कैसे विनती तुम्हारी गायैं, अमृत वचन में हम तो नहायै,
मेरा सब सन्देह मिटाया, जन्मों का झकझोर झुड़ाया,
सुखसागर घर मैंने पाया, सतगुरु मुझको दर्श कराया,
"दर्शन दिये मुनीन्द्र तुम, कर दिया मुझे सनाथ,
भवसागर से ले चले, पकड़ के मैरा हाथ"
"हनुमान सेवक/आधीन हुए, लिया था तब पान,
मुनीन्द्र ने तब शिष्य किये, दिया समर्थ का ज्ञान"
खण्ड़ ब्रह्माण्ड़ सभी के पार, वहाँ समर्थ का घर तक सार,
निर्भय घर है भाई वहाँ पर, रोग काल ना कोई जहाँ पर,
उसका तुमने सुना विचार, समर्थ का घर सबके पार,
बिन आधार है सबके पार, पिण्ड़ ब्रह्माण्ड ताके आधार,
सबसे न्यारा सबसे पार, हनुमत मन में लियो विचार,
ये सब हैं समर्थ आधार, उसकी शक्ति का वार ना पार,
उसकी आस करै जो कोई, भवसागर से उतरे वोही,
"हनुमत कहे सुनो साहिब, तुम हो दीन दयाल,
तुम समान कोई नहीं, काटा यम का जाल"
(तब कबीर साहिब जी ने धर्मदास जी से कहा...)
कहै कबीर सुनो धर्मदास, वहीं ज्ञान मैंने तुम्हें प्रकाश,
हनुमंत अंश पुरुष का भाई, तभी मिले हम उसको आई,
धर्मदास तुम वंश हमारे, आपके लिये ही हम है पधारे,
"हनुमत को सतज्ञान दिया, सुन लो धर्मदास,
पान परवाना दे कर , आया आपके पास"
"धर्मदास वंदन करैं, धन्य हो सत्य कबीर,
हनुमत को दर्शन दिये, धन्य है हनुमत वीर"
"धन्य-धन्य साहिब धन्य, दर्शन दिए है आय,
चरण आपकै हम पड़ै, लीन्हा शरण लगाय"
"हनुमत ने ज्ञान लेकर, कर लिया है उद्धार,
शेष शारदा विष्णु नारद, ना पायेंगे पार"
"नहीं पावेंगे पार शिव, ब्रह्मा और नारद भी,
धर्मदास वंदन करैं, आप की छवि निहार"...!!!
सत् साहिब!!!
जय हो सदगुरु देव जी की!!!  supremegod.org click here