परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं

परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं
धरती पर सतलोक संत रामपाल जी महाराज ने उतार दिया है सतलोक आश्रम में

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

मृत्यलोक के ब्रह्मांडो का संचालन कौन करता है ?

📘 तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा रचित
ज्ञान गंगा (Gyan Ganga)


“ज्ञान गंगा” तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा रचित एक महान आध्यात्मिक ग्रंथ है, जिसमें वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, पुराण, बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब के शास्त्र प्रमाणों के आधार पर पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब का तत्वज्ञान दिया गया है।

🔱 सृष्टि रचना का सत्य

इस ब्रह्मांड का संचालन काल (क्षर पुरुष) करता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जन्म-मरण के बंधन में हैं। इन सबसे परे कबीर परमेश्वर हैं, जो सतलोक के स्वामी हैं।

🕉️ शास्त्रानुकूल भक्ति का महत्व

गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में अर्जुन से कहा गया है कि तत्वदर्शी संत की शरण में जाकर ही यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मनमानी पूजा से मोक्ष संभव नहीं।

🌼 मानव जीवन का उद्देश्य

  • जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति
  • सतलोक की प्राप्ति
  • पूर्ण परमात्मा की भक्ति

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तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेने के लिए मिस कॉल करें।


📺 साधना टीवी पर सत्संग

🕢 रोज शाम 07:30 बजे से 08:30 बजे तक
तत्वज्ञान आधारित सत्संग अवश्य सुनें।


🔗 महत्वपूर्ण लिंक


📖 “ज्ञान गंगा” — अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाली दिव्य पुस्तक

जय कबीर साहेब 🙏

आध्यात्मिक सत्य : शास्त्र, साधना और प्रलय का रहस्य जानिए यहां ..

🔱 आध्यात्मिक सत्य : शास्त्र, साधना और प्रलय का रहस्य 🔱

यह लेख गीता, उपनिषद और संतवाणी के आधार पर आध्यात्मिक प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देता है।


❓ 1. मनुष्य ना चाहते हुए भी पाप क्यों करता है?

श्रीमद्भगवद्गीता 3.36–37 में अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य इच्छा के विरुद्ध पाप क्यों करता है।

उत्तर: काम, क्रोध और लोभ — जो रजोगुण से उत्पन्न होते हैं — मनुष्य को पाप कर्मों में प्रवृत्त करते हैं।

❓ 2. ब्रह्मरंध्र क्या है? नहीं खुला तो क्या होता है?

ब्रह्मरंध्र सिर के शीर्ष पर स्थित वह दिव्य द्वार है जिससे आत्मा के निकलने पर पुनर्जन्म समाप्त हो जाता है।

  • पूर्ण गुरु से दीक्षा
  • सत्य नाम-स्मरण
  • अहंकार का त्याग

यदि ब्रह्मरंध्र नहीं खुलता, तो आत्मा अन्य द्वारों से निकलकर पुनर्जन्म में जाती है।

❓ 3. कमल (चक्र) खुलने पर भक्ति शक्ति कैसे बढ़ती है?

शरीर के सूक्ष्म कमल ऊर्जा केंद्र हैं। इनके जाग्रत होने पर:

  • मन अंतर्मुखी होता है
  • प्राण स्थिर होता है
  • नाम-स्मरण गहरा होता है

👉 भक्ति भावना नहीं, आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है।

⏳ 4. कल्प, महाकल्प और दिव्य महाकल्प

  • कल्प: ब्रह्मा का 1 दिन = 4.32 अरब वर्ष
  • महाकल्प: ब्रह्मा के 100 वर्ष
  • दिव्य महाकल्प: सतलोक का समय — कालातीत

🔥 5. तीन महाप्रलय का सत्य

  1. नैमित्तिक प्रलय – ब्रह्मा की रात्रि
  2. प्राकृत प्रलय – ब्रह्मांड व देवताओं का नाश
  3. दिव्य महाप्रलय – काल, माया और सृष्टि का अंत

❓ 6. क्या काल और दुर्गा अमर हैं?

नहीं। शास्त्रों के अनुसार काल (क्षर ब्रह्म) और दुर्गा (प्रकृति) भी तीसरी दिव्य प्रलय में समाप्त होते हैं।

❓ 7. तीसरी दिव्य महाप्रलय कौन करता है?

यह प्रलय परम अक्षर ब्रह्म (सतपुरुष) की सत्ता से होती है।

👉 केवल सतलोक और मुक्त आत्माएँ शेष रहती हैं।

❓ 8. सत्य कहना निंदा है क्या?

शास्त्र प्रमाण सहित कहा गया सत्य निंदा नहीं बल्कि चेतावनी और सुधार है।

“निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय” – कबीर साहेब


🌼 निष्कर्ष 🌼

✔ पाप का कारण काम है
✔ मोक्ष का द्वार ब्रह्मरंध्र है
✔ भक्ति शक्ति है, भावना नहीं
✔ सत्य कहना धर्म है, निंदा नहीं

📌 शास्त्र पढ़िए • सत्य जानिए • अंधविश्वास से बचिए

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

निःशुल्क पुस्तक वितरण सेवा

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जनहित में —  पुस्तक बिल्कुल FREE आपके घर भेजी जाएगी, विवरण भरिए ....

नोट: 30 दिनों के भीतर आपके द्वारा दिए गए पते पर यह पवित्र पुस्तक पहुँचा दी जाएगी।

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❤️🙏 परमात्मा का अवतरण 🙏❤️

परमात्मा भारत में अवतरित हो चुके हैं
सर्वोच्च संत के रूप में

✨ स्वर्ण युग की भविष्यवाणी ✨

विश्व प्रसिद्ध भविष्यवक्ता फ्लोरेंस (न्यू जर्सी, अमेरिका) ने कुछ दशक पूर्व अपनी पुस्तक “Golden Light of a New Era” में एक महान आध्यात्मिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की थी।

“मैं उत्तर भारत के एक पवित्र क्षेत्र को स्पष्ट देख सकती हूँ, जहाँ एक महान संत कठोर साधना में लीन होकर ऐसी दिव्य ऊर्जा का संचार करेंगे, जो सम्पूर्ण विश्व में युग परिवर्तन का कारण बनेगी।”

फ्लोरेंस के अनुसार इस संत की क्रांतिकारी आध्यात्मिक सोच विचार-क्रांति (Thought Revolution) को जन्म देगी, जिससे पूरी मानवता एक सूत्र में बँध जाएगी।

🌍 एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक मार्गदर्शक

भविष्यवाणी के अनुसार विभिन्न धर्मों के अनुयायी इस महान संत को अपने-अपने दृष्टिकोण से पहचानेंगे — मुस्लिम उन्हें पैग़म्बर मोहम्मद के रूप में, ईसाई प्रभु यीशु के रूप में और हिंदू उन्हें परमात्मा का 10वाँ अवतार मानेंगे।

📘 भविष्यवाणियों की सच्चाई

फ्लोरेंस ने वर्ष 2000 से पहले भूकंप, पर्यावरण असंतुलन, नैतिक पतन और वैश्विक अशांति की भी भविष्यवाणी की थी, जिनमें से अनेक घटनाएँ आज साकार हो चुकी हैं।

🌿 उत्तर भारत के महान संत 🌿

वे संत और कोई नहीं बल्कि तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ही है

संस्थापक – सतलोक आश्रम, बरवाला (हिसार), भारत

वे परमेश्वर परमात्मा कबीर का सत्य आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान कर मानवता को मोक्ष और विश्व शांति की ओर मार्गदर्शन कर रहे हैं।

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विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक पुस्तक
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Supremegod God Has Come seeProof Here

❤️🙏 The Supreme GOD Has Appeared 🙏❤️

The Supreme GOD has come to India in the form of
Supreme Saint :contentReference[oaicite:1]{index=1}

✨ Prediction of a Golden Era ✨

The world-famous forecaster Florence, a highly intellectual divine seer from New Jersey (USA), made a historic proclamation decades ago in her book “Golden Light of a New Era”.

“I can clearly see a sacred region of North India where a saint immersed in intense spiritual practices radiates a divine flow capable of transforming the entire world. His revolutionary thoughts shall ignite a global Thought Revolution.”

According to Florence, this great saint would re-establish spirituality, unite humanity under the concept of One World – One Human Religion, and inspire a global transformation of consciousness.

🌍 A Universal Spiritual Guide

Florence stated that followers of different faiths would recognize this saint according to their belief systems — as Prophet Mohammad, Lord Jesus Christ, or the 10th Avatar of God — due to his extraordinary divine energy and spiritual wisdom.

📘 Authenticity of Florence’s Prophecies

Florence also foretold earthquakes, environmental imbalance, social unrest, and moral decline before the year 2000 — many of which have already come true across India and the world, proving the accuracy of her foresight.

🌿 The Saint from North India 🌿

That saint is none other than
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Founder of Satlok Ashram, Barwala (Hisar), India

He provides true spiritual knowledge of Supreme GOD Kabir and guides humanity towards salvation and world peace.

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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

क्या गीता में व्रत रखने को मना किया गया है

 गीता के अनुसार: क्या व्रत (पूरी तरह भूखा रहना) सही है?


अक्सर यह मान लिया जाता है कि धार्मिक होना मतलब व्रत रखना और व्रत का अर्थ भूखा रहना।

लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता इस विचार का समर्थन नहीं करती।


भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता में स्पष्ट कहते हैं कि न तो बहुत अधिक खाना योग है और न ही बिल्कुल न खाना।


गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में कहा गया है:


नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति

न चैकान्तमनश्नतः।

न चाति स्वप्नशीलस्य

जाग्रतो नैव चार्जुन॥


इसका सीधा अर्थ है:

जो बहुत खाता है उसका भी योग नहीं होता, और जो बिल्कुल नहीं खाता यानी पूरी तरह भूखा रहता है, उसका भी योग नहीं होता। जो बहुत सोता है या बहुत जागता है, वह भी योग में सफल नहीं हो सकता।


यहाँ “न च एकान्तम् अनश्नतः” शब्दों से भगवान पूरी तरह भूखे रहने को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं।


इसके तुरंत बाद गीता अध्याय 6 श्लोक 17 में संतुलन का सिद्धांत बताया गया है:


युक्ताहारविहारस्य

युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य

योगो भवति दुःखहा॥


अर्थ यह है कि जिसका भोजन संतुलित है, जिसका विहार और कर्म संतुलित हैं, और जिसका सोना–जागना संतुलित है, उसी का योग दुःखों को नष्ट करने वाला होता है।


इससे साफ होता है कि गीता का मार्ग अति का नहीं, संतुलन का है।


फिर प्रश्न उठता है कि कठोर व्रत और लंबे उपवास की परंपरा कहाँ से आई?


यह गीता से नहीं आई। यह बाद की सामाजिक परंपराओं, कर्मकांड, दिखावे और अहंकार से जुड़ी साधनाओं से विकसित हुई। स्वयं गीता ऐसे तप की आलोचना करती है।


गीता अध्याय 17 श्लोक 5 और 6 में कहा गया है कि जो लोग शास्त्र के विरुद्ध, दिखावे और अहंकार से शरीर को कष्ट देने वाला तप करते हैं, वे आसुरी प्रवृत्ति के होते हैं।


गीता में व्रत का वास्तविक अर्थ भूखा रहना नहीं है।

व्रत का शास्त्रीय अर्थ है संयम, विवेक और धर्म-संकल्प।


अर्थात:

इंद्रियों का संयम

संतुलित जीवन

अहंकार का त्याग

और कर्तव्य का पालन


इसलिए निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है:


पूरी तरह भूखा रहना, शरीर को तोड़ने वाला व्रत और हठयोग – गीता के अनुसार योग नहीं है।

संतुलित भोजन, संतुलित जीवन और विवेकपूर्ण साधना – यही गीता का मार्ग है।


गीता भूखे साधु नहीं बनाती,

गीता संतुलित, विवेकशील और जागरूक योगी बनाती है।



ज्यादा जानकारी हेतु देखिए साधना टीवी पर रोज शाम 07:30 बजे से 8:30 बजे तक


Supremegod.org

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

श्री रामचंद जी को वनवास कब शुरू हुआ और कब 14 साल पूरे हुए जानिए यहां

 श्री राम चंद्र जी को वनवास कब शुरू हुआ और कब 14 साल पूरे हुए ?

पहली दीपावली कब मनाई गई आइए जानते है यहां ?

जो गलती आज  कलयुग का एक अच्छा पुरुष नहीं कर सकता वो एक गलती पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तम श्री राम कैसे कर सकते है?  आईए जानते हैं...

अध्ययन करने पर पाया गया है कि श्री राम चंद जी को वनवास चैत माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को शुरू हुआ और चैत माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को 14 साल पूरे हुए थे ,और उस अष्टमी की रात भगवान राम सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे थे, अयोध्या वासियों ने खुशी में दीपावली मनाई,  2 साल बाद श्री राम चंद्र ने बेकसूर पवित्र पत्नी को घर से राज्य से निकाल कर वन में छोड़ दिया। माता सीता को न तो पत्नी के अधिकार के तहत रोटी कपड़ा मकान दिया। न ही अयोध्या के नागरिक होने के नाते रोटी कपड़ा मकान दिया।  एक ऐसी सजा दी जो उन्होंने अपने जीवन काल में बड़े बड़े अपराधियों को भी नहीं दी होगी। इसके मूल कारणों को  बाल्मीकि और तुलसीदास ने विस्तार से लिखा नहीं है। लेकिन जितना लिखा है वो भी आज आम  इंसान जो अच्छाइयों से भरा हो अपने घर परिवार में पत्नी के साथ कभी नहीं करता। फिर जो इंसानी में श्रेष्ठ हो यानि पुरुषों में श्रेष्ठ हो फिर वो ऐसा कैसे कर सकता है ? लेकिन दुखद उन्होंने ऐसा करके मानवता का उच्च दर्जा को गिराया है।  उनके इस कार्य से अयोध्या की अच्छी जनता बहुत दुखी हुई और इस दुख शौक में उसने फिर कभी दीपावली नहीं मनाई। त्रेता के बाद द्वापर मे युग में भी दीपावली मनाने के कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं। 
कलयुग में भी गुलामी से पहले दीपावली मनाने के कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं। 
गुलामी के दौर में वह ज्ञान, इतिहास धूमिल हो गया। और आने वाली पीढ़ियां को वह जान इतिहास ट्रांसफर हुआ नहीं। नतीजा यह रहा कि गुलामी के समय नई पीढ़ियां ने सुनी सुनाई बातों के आधार पर , अटकलों के आधार पर, मनमाने आचरण शुरू किए। जिस कारण लोग दीपावली चैत माह में न मना कर कार्तिक माह की अमावस्या को मनाने लगे, जिस कारण संसार को लाभ के बजाय हानि होने लगी। और लोग तेजी से नास्तिक बनने लगे। जब लोग भगति साधना के नाम पर शास्त्र विरुद्ध मनमाने आचरण करती है तब दंड स्वरूप कुदरत संसार पर कहर बरसाती है। इतिहास इस बात का गवाह है। देवी भागवत पुराण में सत्य कथा आती है कि देवी दुर्गा जी ने एक गलती के आधार पर ब्रह्मा जी को शाप दिया कि तुम्हारी जग में पूजा नहीं होगी, और तुम्हारे वंशजों को भी सत्य का जान नहीं होगा ,खुद बोलकर संसार का नाश करेंगे। ब्रह्मा जी के वंशज ब्राह्मण हुए। सतयुग से लेकर आज तक ब्राह्मण देवी दुर्गा जी के शाप से शापित है । जिस कारण इनके पास वास्तविक सत्य नहीं है केवल झूठ है इनके पास। ये हृदय से भले ही बहुत अच्छे हो लेकिन शाओ के कारण ये न चाहते हुए भी अज्ञान को बढ़ावा दे रहे है और संसार का नाश कर रहे है।  गीता जी में भगवान ने कहा कि मेरी माया के अज्ञान जाल से बचाने वाला तत्वदर्शी संत अपने तत्वज्ञान से जीवो को मुक्त करता है और सत्य भरी देकर मुख धाम ,परम शांति लोक सनातन लोक को ले जाता है। तत्वदर्शी संत एक समय में एक ही होता है, वहीं सदगुरु होता है। वह सनातन लोक से आया हुआ परम शक्ति होता है। आज हमारे लिए खुश खबरी है कि आज सर्व रहस्यों को बताने वाला, अज्ञान माया को तत्वज्ञान से काटने वाला, मुक्ति देने वाला परम शांति देने वाला , सनातनलोक लेजाने वाला परम तत्वदर्शी संत रामपाल जी रूप में साक्षात् परमेश्वर कवि जी लीलाएं कर रहे हैं। सुप्रीम गॉड डॉट ओ आर जी वेबसाइट पर जाकर देखिए आगे के असंख्य रहस्य प्रमाणों सहित।। यहां तत्वज्ञान की पढ़ाई करके आप वास्तविक ज्ञानी, जानकर ,विद्वान बनोगे यह मेरी गारंटी है। साधना टीवी पर मिलिए रोज शाम 07:30 से
 08: 30 बजे तक  धन्यवाद। 
(( सच्चा सनातन धर्मी की कलम से ))





गुरुवार, 2 जनवरी 2025

अजर अमर सनातन लोक vs स्वर्ग लोक इंपोर्टेंट जानकारी

अजर अमर स्व प्रकाशित सत्य सनातन लोक में ही पहले सब रहते थे। वहां ब्रह्म ने तप करके परमेश्वर से मृत्युलोक प्राप्त किया और बाद में हम असंख्य आत्माएं इस ब्रह्म के बहकावे में आकर सतलोक छोड़कर इस मृत्युलोक में आए थे। जिस गलती का दंड सर्व आत्माएं यहां कष्ट दुख इत्यादि के रूप में भोग रही हैं। ब्रह्म ने अपनी माया से सर्व आत्माओं का याददाश्त रूपी सच्चा जान हर लिया और झूठा अज्ञान भर दिया । जिस कारण आत्माओं को अब अपना इतिहास जान याद नहीं और घर वापस जाने की भी कोई चिंता न रही। यहां आत्माओं के कष्ट से द्रवित होकर परमेश्वर इस मृत्युलोक के धरती पृथ्वी कर हर युग में आकर साधारण मनुष्य की तरह लीला करके सर्व सत्य बताता है। और विशेष शक्ति युक्त मंत्र देकर भगति को शक्ति से युक्त करके वापस अजर अमर निज धाम सतलोक  ले जाता है। जिसे परम गति ,परम मोक्ष इत्यादि कहां गया। जहां जाने के बाद जीव जन्म मरण से मुक्त हो जाता है। और उसी सत्यलोक की दुनिया में अपने परिजन आत्माओं के साथ परम आनंद के साथ रहता है।  स्वर्ग लोक एक छोटा सा रेस्टोरेंट टाइप एक होटल जैसा स्थान है। जो पुण्य कर्मी आत्माओं को रहने के लिए दिया जाता है। जब पुण्य को शक्ति खत्म हो जाती है तो वापस धरती पर भेज दिया जाता है। आईए जानते है शास्त्रों से  दोनों का अंतर..


🔹 स्वर्ग लोक और सतलोक में अंतर


श्रीमद्देवी भागवत पुराण के तीसरे स्कन्ध के पृष्ठ 123 के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी नाशवान हैं यानी देवताओं का स्वर्गलोक भी नाशवान है।


जबकि संत गरीबदास जी महाराज ने मोक्ष स्थान सतलोक के विषय में कहा है:


ना कोई भिक्षुक दान दे, ना कोई हार व्यवहार। 

ना कोई जन्मे मरे, ऐसा देश हमार।।


🔹 सतलोक Vs स्वर्ग


हम सभी जानते हैं यह लोक नश्वर है यानी जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होगी और यह चक्र स्वर्गलोक से लेकर ब्रह्मलोक तक चलता है।


जबकि सतलोक, वह मोक्ष स्थान है जहाँ जन्म मृत्यु का दुःख नहीं है। बल्कि वहाँ सुख ही सुख है। इसलिए संतों ने मोक्ष स्थान सतलोक को सुख सागर कहा है। संत गरीबदास जी ने इस बारे में कहा है:


जहां संखों लहर मेहर की उपजैं, कहर जहां नहीं कोई।

दासगरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई।।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


मोक्ष वह स्थान है जहाँ जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था का दुःख नहीं होता।


गीता अध्याय 8 श्लोक 16 के अनुसार, स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में गए प्राणियों का भी पुनर्जन्म होता है।


वहीं, गीता अध्याय 18 श्लोक 62 के अनुसार, मोक्ष का स्थान सतलोक है जहाँ कोई कष्ट नहीं है बल्कि वहाँ परम शांति है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक सहित काल ब्रह्म के 21 ब्रह्मांडों में शांति व सुख का नामोनिशान नहीं है। त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, मान-बड़ाई रूपी अवगुण हर जीव को इन लोकों में परेशान किए हुए हैं। जबकि सतलोक में केवल एक रस परम शांति व सुख है। जब तक हम सतलोक में नहीं जाएंगे तब तक हम परमशांति, सुख व मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते। जिससे स्पष्ट है कि सतलोक ही मोक्ष स्थान है।


🔹मोक्ष स्थान सतलोक


मोक्ष स्थान वह स्थान है जहाँ अजर-अमर स्थिति होती है और जहाँ जाने के बाद प्राणी का जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है।


धर्म शास्त्रों के अनुसार, स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक नाशवान हैं जबकि सतलोक (सनातन परम धाम) अविनाशी लोक है। क्योंकि सतलोक में जाने के बाद साधक को लौटकर संसार में वापस नहीं आना पड़ता। इसलिए मोक्ष स्थान सतलोक है।


🔹 सतलोक Vs स्वर्ग


सतलोक वह मोक्ष स्थान है जहां जन्म-मृत्यु, वृद्धावस्था या अन्य दुख व पीड़ा नहीं होती, जो इसे स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक से श्रेष्ठ बनाता है।


स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक के देवता और 21 ब्रह्मांड का स्वामी काल ब्रह्म भी नाशवान हैं।


🔹सतलोक में आत्मा को पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है, जो स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में असंभव है। स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक की आत्माएं जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधी रहती हैं, जबकि सतलोक में आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग

सतलोक जाने के बाद आत्मा का पूर्ण मोक्ष हो जाता है जिससे आत्मा को 84 लाख योनियों का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जबकि स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में जाने के बाद आत्मा को कर्मों के आधार पर स्वर्ग, नरक, 84 लाख योनियों का कष्ट भोगने के बाद पुनः पृथ्वी पर जन्म-मृत्यु के चक्र में आना पड़ता है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


मोक्ष वह स्थान है जहाँ जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था का दुःख नहीं होता।


गीता अध्याय 8 श्लोक 16 के अनुसार, स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में गए प्राणियों का भी पुनर्जन्म होता है।


वहीं, गीता अध्याय 18 श्लोक 62 के अनुसार, मोक्ष का स्थान सतलोक है जहाँ कोई कष्ट नहीं है बल्कि वहाँ परम शांति है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्मलोक तक सभी लोक और उनमें गए हुए प्राणी पुनरावृत्ति यानी जन्म-मृत्यु के चक्र में हैं। अर्थात ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक तक गए प्राणियों का मोक्ष नहीं होता।


जबकि गीता अध्याय 18 श्लोक 62 और अध्याय 15 श्लोक 4 में सनातन परम धाम यानी सतलोक का वर्णन किया गया है, जहाँ जाने के बाद लौटकर संसार में नहीं आना पड़ता, यानी पूर्ण मोक्ष प्राप्त हो जाता है। इसलिए मोक्ष स्थान सतलोक है।