गीता के अनुसार: क्या व्रत (पूरी तरह भूखा रहना) सही है?
अक्सर यह मान लिया जाता है कि धार्मिक होना मतलब व्रत रखना और व्रत का अर्थ भूखा रहना।
लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता इस विचार का समर्थन नहीं करती।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता में स्पष्ट कहते हैं कि न तो बहुत अधिक खाना योग है और न ही बिल्कुल न खाना।
गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में कहा गया है:
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति
न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य
जाग्रतो नैव चार्जुन॥
इसका सीधा अर्थ है:
जो बहुत खाता है उसका भी योग नहीं होता, और जो बिल्कुल नहीं खाता यानी पूरी तरह भूखा रहता है, उसका भी योग नहीं होता। जो बहुत सोता है या बहुत जागता है, वह भी योग में सफल नहीं हो सकता।
यहाँ “न च एकान्तम् अनश्नतः” शब्दों से भगवान पूरी तरह भूखे रहने को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं।
इसके तुरंत बाद गीता अध्याय 6 श्लोक 17 में संतुलन का सिद्धांत बताया गया है:
युक्ताहारविहारस्य
युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य
योगो भवति दुःखहा॥
अर्थ यह है कि जिसका भोजन संतुलित है, जिसका विहार और कर्म संतुलित हैं, और जिसका सोना–जागना संतुलित है, उसी का योग दुःखों को नष्ट करने वाला होता है।
इससे साफ होता है कि गीता का मार्ग अति का नहीं, संतुलन का है।
फिर प्रश्न उठता है कि कठोर व्रत और लंबे उपवास की परंपरा कहाँ से आई?
यह गीता से नहीं आई। यह बाद की सामाजिक परंपराओं, कर्मकांड, दिखावे और अहंकार से जुड़ी साधनाओं से विकसित हुई। स्वयं गीता ऐसे तप की आलोचना करती है।
गीता अध्याय 17 श्लोक 5 और 6 में कहा गया है कि जो लोग शास्त्र के विरुद्ध, दिखावे और अहंकार से शरीर को कष्ट देने वाला तप करते हैं, वे आसुरी प्रवृत्ति के होते हैं।
गीता में व्रत का वास्तविक अर्थ भूखा रहना नहीं है।
व्रत का शास्त्रीय अर्थ है संयम, विवेक और धर्म-संकल्प।
अर्थात:
इंद्रियों का संयम
संतुलित जीवन
अहंकार का त्याग
और कर्तव्य का पालन
इसलिए निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है:
पूरी तरह भूखा रहना, शरीर को तोड़ने वाला व्रत और हठयोग – गीता के अनुसार योग नहीं है।
संतुलित भोजन, संतुलित जीवन और विवेकपूर्ण साधना – यही गीता का मार्ग है।
गीता भूखे साधु नहीं बनाती,
गीता संतुलित, विवेकशील और जागरूक योगी बनाती है।
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