परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं

परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं
धरती पर सतलोक संत रामपाल जी महाराज ने उतार दिया है सतलोक आश्रम में

शुक्रवार, 5 जून 2015

भ्रष्ट जजों की दास्तान


भ्रष्ट जजों की दास्तान 



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने भारतीय न्याय प्रक्रिया पर बड़ा हमला बोला है। काटजू ने एक ब्लॉग लिखकर 50 फीसदी भारतीय जजों को भ्रष्ट करार दिया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय न्याय प्रणाली में बड़ी खामी है जिसे ठीक किया जाना बहुत जरूरी है।
 >1971 तक भ्रष्टाचार नहीं था कोर्ट में > काटजू ने लिखा है कि जब उन्होंने 1971 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से अपना कैरियर शुरु किया उस समय भारत की किसी भी कोर्ट में संभवत: भ्रष्टाचार नहीं था। लेकिन बाद में हाई कोर्ट में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार बढ़ता गया। उन्होंने कहा कि 1994 में जस्टिस वेंकटचेलैया जोकि मुख्य न्यायाधीश के समय में बड़ी संख्या में न्यायाधीशों का भ्रष्टाचार के चलते तबादले किये गये थे।
मैंने खुद इलाहाबाद हाई कोर्ट पर सवाल उठाया था वहीं 2001 में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भरूच ने कहा था कि 20 फीसदी हाई कोर्ट के जज भ्रष्ट हो सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि मौजूदा समय में 50 फीसदी हाई कोर्ट के जज भ्रष्ट हैं। काटजू ने कहा कि 2011 के राजा खान बनाम सेंट्रल वक्फ बोर्ड के केस में मेरी खुद की बेंच जिसमें जस्टिस ग्यान सुधा मिश्रा भी शामिल थे को कहना पड़ा था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है

शांति भूषण के अपील को भी दबाया गया काटजू ने कहा कि शांति भूषण जोकि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं और पूर्व में कानून मंत्री भी रह चुके हैं ने खुद सुप्रीम कोर्ट में एक एफीडिविट दाखिल किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि पूर्व के 16 मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। लेकिन मेरा मानना है कि उसके बाद से इस सूचि में और भी कई नाम जुड़ गये होंगे। शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सीके प्रसाद के खिलाफ भ्रष्टाचार के चलते एफआईआर दाखिल करने की अपील की थी। लेकिन भारत की सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को दबा दिया था।
 सुप्रीम कोर्ट के जज ने 1000 करोड़ का भ्रष्टाचार किया काटजू ने कहा कि जस्टिस प्रसाद के खिलाफ मामला मेरे सामने भी आया था। जिसमें उनके खिलाफ 35 एकड़ जमीन जिसकी कीमत तकरीबन 1000 करोड़ रुपए थी को खरीदने का आरोप था। यह मामला 3 जजों की बेंच के पास था जिसमें से दो जजों ने इस मामले में महज कुछ मिनटों में अपनी मनमानी करते हुए जस्टिस प्रसाद के समर्थन में फैसला दिया था।
 जजों के खिलाफ सबूतों को दबा दिया गया वहीं इस मामले में दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के बार काउंसिल एसोसिएशन में अपने जस्टिस प्रसाद के खिलाफ कई सबूत पेश किये थे। दवे ने अपने पत्र में लिखा था कि जस्टिस प्रसाद के द्वारा बनी बेंच जमीन के मामले की इतनी जल्दी सुनवाई करने के लिए क्यों आतुर थी। उन्होंने लिखा था कि अप्राकृतिक जल्दबाजी कई सवाल उठाती है। उन्होंने साथ ही अपने पत्र में लिखा था कि इस मामले को बिना बहस के ही पूरा कर लिया गया था।
क्या न्याय प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को उजागर नहीं करना चाहिए? काटजू ने कहा कि मेरे अनुसार प्रथम दृष्टया यह भ्रष्टाचार का मामला था और जस्टिस प्रसाद के खिलाफ एफआईआर होनी चाहिए थी। ऐसे में शांति भूषण की इस मामले में एफआईआर दर्ज करने की अपील बिल्कुल जायज थी। वहीं जब मैंने तीन जजों के भ्रष्टाचार की बात कही थी तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधी जस्टिस लोढ़ा ने कहा था कि कुछ लोग भारत की न्याय प्रक्रिया को बदनाम करना चाहते हैं। ऐसे में मेरा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार को लोगों के सामने नहीं लाना चाहिए///
इन भ्रष्ट जजों के खिलाफ आवाज उठाई है भारत के  एकमात्र महान अध्यात्मिक संत जगतगुरु रामपाल जी महाराज ने .....और इन भ्रष्ट जजों ने इस आवाज को दवाने के लिए उन पर झूठे केस लगा कर जेल में दाल दिया है ... और मिडिया के द्वारा भ्रामक प्रचार करवा दिया .... हे .. भारत की महान जनता आप अपने विवेक का प्रयोग कर सारी घटनाओ का निरपेक्ष रूप से निरिक्षण करो ...यदि आज आप चुक गये तो आपको इस भ्रष्ट तंत्र से मुक्ति नही मिल सकती .... आज आपको चाहिए सभी जनता संत जगतगुरु रामपाल जी का समर्थन करे भ्रष्ट जजों के खिलाफ .... बस यही आपको भ्रष्ट तंत्र से मुक्ति दिला सकते है . .. और अधिक जाने नाम सहित भ्रष्ट जजों को और उनकी कारस्तानियो को ..इस लिंक पर जाईये --http://www.rsss.co.in/books/bjkp.pdf 

जागो भारतीयों जागो ...जाने अधिक इस लिंक से   ..http://www.rsss.co.in/ 

गुरुवार, 4 जून 2015

काफिर कौन

काफिर कौन 

प्रत्येक वो हिन्दू
काफिर है
जो भगवद्गीता जी के
विरुद्ध
साधना का ढोंग
करता हो।
प्रत्येक वो मुस्लिम
काफिर है जो कुराने
पाक के आदेश
ना मानता हो।
प्रत्येक जैनी,सिक्ख
या ईसाई जो स्वयं के
सदग्रंथ के ज्ञान
को ना स्वीकार करें
वो सब काफिर है।
प्रत्येक
वो व्यक्ति काफिर है
ढोगीं और पाखंडी है
जो वेदों को तो शिरोधार्य
मानता हो पर
कविर्देव या कबीर
को परमात्मा ना मानता हो।
∆ निरन्जन धन तेरा दरबार-२
जहाँ पर तनिक न न्याय विचार-२
∆ पाखंडी की पूजा जग में,
संत को कहैं लबार-२
अग्यानी को परम विवेकी,
ग्यानी को मूढ़ गँवार-२
∆ कहै कबीर सुनो भाई साधो,
सब उल्टा व्यव्हार-२
सच्चों को तो झूठ बतावैं,
इन झूठों का ऐतबार-२
∆ निरन्जन धन तेरा दरबार-२
संत सताये तीनो जाए, तेज बलऔर वंश |
ऐसे ऐसे कई गये, रावण कौरव कंश ||
*** सत- साहेब ***

भारत देश की दुर्गति का यह एक प्रमुख कारण

भारत देश की दुर्गति का यह एक प्रमुख कारण 

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!
हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??
यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !
भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !
रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।
वह जोर से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।
ये उल्लू चिल्ला रहा है।
हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??
ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।
पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।
सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।
हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!
यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा
पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।
हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??
अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!
उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।
दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये।
कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी।
पंचलोग भी आ गये!
बोले- भाई किस बात का विवाद है ??
लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!
लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।
हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है।
इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!
फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!
यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।
उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!
रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!
हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??
पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?
उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!
लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!
मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।
यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!
शायद 65 साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता न देखते हुए, हमेशा ये हमारी जाति का है. ये हमारी पार्टी का है के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!

मंगलवार, 2 जून 2015

परमेश्वर कबीर साहिब जी प्रकट दिवस

परमेश्वर कबीर साहिब जी प्रकट दिवस



जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के अमृत सत्संगों से एक महत्वपूर्ण प्रसंग...
सत् साहिब जी भक्त आत्माओं..
600 साल पहले जब परमेश्वर कबीर साहिब जी काशी में आये थे तो अपना अनमोल तत्व ज्ञान जन-जन में प्रचारित करते थे और हमें समझाया करते थे और कहते थे कि आपको जो ये ज्ञान मार्गदर्शक(नकली धर्मगुरु) मिले हुए है ये सब अधूरे ज्ञान पर आधारित है। ये सब आपको गुमराह कर रहे है। लेकिन इन नकली धर्मगुरुओं ने काल प्रेरणा से अपने स्वार्थवश हमें अपने परमात्मा का ही दुश्मन बना दिया। परमात्मा का घोर विरोध करवा दिया। क्योंकि उस समय जनता अशिक्षित थी। इसी बात का लाभ यह नकली धर्मगुरु उठाते रहे और हमें अपने परमात्मा से दूर रखे रखा। जब परमात्मा अपने ज्ञान का प्रचार कहते थे तब हिन्दू और मुसलमान दोनों को समझाया करते थे कि जो साधना तुम कह रहे हो वह साधना तुम्हारी ठीक नहीं है। आप सब शास्त्रविधि को त्यागकर मनमानी पूजाएँ कर रहे हो इन साधनाओं से न तो आपको कोई सुख होगा और न ही कोई गति होगी। ये आपकी गीताजी बता रही है। लेकिन वह नकली स्वार्थी लोग इस बात को ऊपर नहीं आने देते थे। वह जनता को अपने शिक्षित होने का एवं परमेश्वर कबीर साहिब जी के अशिक्षित होने का हवाला देकर भ्रमित करते रहते थे।
परमात्मा उस समय उन भोली जनता को समझाया करते थे कि ये जो मार्गदर्शक आपके है ये ठीक नहीं है और उन श्रषियों ब्राह्मणों काजी मुल्लाओं को भी अपने बच्चे समझकर कहते थे...
"मेण्डी जिन्दडिये उस रब दा पंथ विखट है बाट,
मेण्डी जिन्दडिये उस रब दा पंथ विखम है बाट।
वह परमात्मा जिसका वर्णन आपके पवित्र सद्ग्रन्थों में है वह बहुत ही विकट है। क्योंकि उस परमपिता की जानकारी एवं उसकी भक्ति विधि का ज्ञान किसी को भी नहीं है। इसी प्रकार गीताजी वेद कुराण बोलने वाला भगवान भी कह रहा है कि मैं भी नहीं जानता उस परमपिता के विषय में, उसकी जानकारी तो किसी तत्वदर्शी सन्त से पूछों। उसके बिना मुक्ति नहीं है।
परमेश्वर कबीर साहिब जी काजी मुल्लाओं पंडितों को समझाते हुए रहे है कि...
गरीब, गगन मण्डल में महल साहिब का, अन्दर बण्या झरोखा,
एक मुल्ला मस्जिद में कूके, एक पुकारे बोका(बकरे की दर्दभरी आवाज)
गरीब, एक मुल्ला मस्जिद में कूके, एक पुकारे बोका,
इनमें कौन सरे(स्वर्ग) कूं जायेगा, हमकूं लग्या है धोखा।
गरीब, मोहम्मद ने कद मस्जिद पूजी, बाजीद ईद कद खादी,
सुल्तानी कद पानी पूजैं, छाड़ तख्त गए गादी॥
गरीब, कलमा रोजा बंक निवाजा, कद नबी मोहम्मद कीन्हया,
कद मोहम्मद ने मुर्गी मारी, कर्द गले कद दीन्हया॥
यहाँ परमात्मा कह रहे कि कब मोहम्मद साहिब जी ने मस्जिद पूजी, कब बाजीद जी ने ईद मनाई, कब मोहम्मद जी ने कलमा रोजा बंग पढ़ा और कब मोहम्मद जी ने मुर्गी मारी.?
नबी हजरत मोहम्मद जी ने कभी भी ऐसा जुल्म करने की सलाह नहीं दी फिर क्यों तुम परमात्मा के निरीह जीवों को मारते हो। एक तरफ तो आप इन सब महापुरुषों की दुहाई देते हो और दूसरी तरफ आप सारी क्रियायें इनके विपरीत करते हो.?
खण्ड़ पिण्ड़ ब्रह्मण्ड़ न होते, ना थे गाय कसाई,
आदम हव्वा न हूजरा होते, कलमा बंग ना भाई॥
एक बार काशी में काजी मुल्लाओं के कहने पर दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोधी ने कबीर साहिब जी की परीक्षा लेने के लिए एक ग्याभन गाय को काट दिया और कहा कि यदि तुम अल्लाह हो तो इस गाय को जीवित करके दिखाओ।
परमेश्वर कबीर साहिब जी खड़े हुए और दिल्ली के बादशाह एवं हजारों लोगों के सामने उस मरी हुई ग्याभन गाय को बच्चे सहित जीवित कर अपनी सर्मथता दिखाई और कहा कि...
"हम ही अलख अल्लाह है, कुतुब गोस और पीर,
गरीबदास खालिक धनी, हमरा नाम कबीर"।
"मैं कबीर सरबंग हुं, सकल हमारी जात,
गरीबदास पिण्ड़ प्राण में, जुगन-जुगन का साथ"।
फिर परमात्मा ने वहाँ हिन्दू और मुसलमानों को ढेढ़ घण्टे तक प्रवचन दिए और कहाँ कि आप सब एक पिता की संतान हो, तुम सब मेरे ही बच्चे हो। काल ने आपको भ्रमित कर उस परमपिता से दूर कर रखा है...
सन्त गरीबदास जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी में परमेश्वर की वार्ता को बहुत सुन्दर रुप से वर्णन किया है....
गरीब, काशी जौरा दीन का, काजी खिलस करन्त,
गरीबदास उस सरे में, झगड़े आन पड़न्त।
गरीब, सुन काजी राजी नहीं, आपै अलह खुदा,
गरीबदास किस हुकुम से, तूने पकड़ पछाड़ी गाय।
परमात्मा ने कहा कि किसके आदेश से यह गाय तुमने मार दी। यह भगवान का प्राणी है तुम्हें मारने का कोई अधिकार नहीं है।
फिर परमात्मा ने कहा कि...
गऊँ आपनी अम्मा है, इस पर छुरी मत बाह,
गरीबदास घी दूध को, सबही आतम खाय।
यह गाय सबकी मां है। जो दूध पिलाती है वह मां कहलाती है।
जिस ममडी का दूध पीवत हो, धृत(घी) दूध बहु खाई,
उसका फिर तुम कतल करत हो, लेकर करद कसाई।
परमात्मा ने कहा कि जिस माँ का तुम दूध पीते हो, घी खाते हो और फिर उसी को तुम काट रहे हो कहाँ गई आपकी बुद्धि...
गऊँ तुम्हारी माता है, पीवत जिसका दूध,
गरीबदास काजी कुटिल, तेने कतल किया औझूद।
परमात्मा ने काजी मुल्लाओं को समझाते हुए कहा कि...
"ऐसा खाना खाईये, माता के ना हो पीर,
गरीबदास दरगह सरे, तेरे गल में पड़े जंजीर"।
परमात्मा ने कहा कि ऐसा खाना खाओ जिससे माता के पीड़ा ना हो।
गरीब, मुर्गे से मुल्ला भये, मुल्ले से फिर मुर्ग,
गरीबदास दोजख धसै, तुमने पावैं नहीं स्वर्ग।
आज तुम मुर्गे को मार रहे हो कल फिर मुर्गा तुम्हें मारेगा। यह अदला बदला ऐसे ही चलता रहेगा जब तक कि तुम्हें यह तत्व ज्ञान बताने वाला सदगुरु नहीं मिलेगा।
परमात्मा कहते है कि...
"बदला कहीं न जात है, तीन लोक के माय,
और सदगुरु मिले कबीर से तो सतलोक ले जाय"।
काजी कलमा पढ़त है, बाँचे फेर कुरान,
गरीबदास इस जुलम से, तेरे डूबे दोनो जिंहान।
पहले काजी बकरे पर कलमा पढ़कर उसे हलाल करता है फिर पीछे कुरान का पाठ पढ़ता है, परमात्मा ने कहा कि ऐसे जुल्म से तो तुम नरक के भागी बनोगे।
गरीब, दोनों दीन दया करो, मानो वचन हमार,
गरीबदास सूर गऊँ में, एकहि बोलनहार।
सूर गऊँ में जीव एक है, गाय भखो ना सूर,
गरीबदास सूर गऊँ में, दोहूं का एकहि नूर।
परमात्मा ने कहा कि सूर और गऊँ दोनों में एक जैसा ही जीव है। एक जैसा ही दर्द होता है इसलिए किसी भी जीव को मत मारो। जीव हिंसा मत करो।
हिन्दू झटके मार ही, काजी करै हलाल,
गरीबदास दोनों दीन का, तुम्हरा होगा हाल बेहाल।
सुन मुल्ला मरदूद तू, कुफर करै दिन रात,
गरीबदास हक बोलता, और मारै जीव अनाथ।
"हक हलाल पिछान पति कर दूर रे, या मुर्गी रब रुह गऊ क्या सूर रे"
रमजानी रमजान क्या सोच जां दिया, या पकड़ पछाड़ी रूह कहों यो क्या किया..??
परमात्मा ने कहा कि दिन में तो तुम भूखे मरें रोजा रखा और शाम को मुर्गा मार कर खा लिया...ये क्या भक्ति हुई भई..??
खूनी खून उजार खाल क्यों काढ़ता,
वो देखे रब रहमान गले क्यों बाढ़ता।
परमात्मा के जीवों को क्यों काट रहे हो, वह परमात्मा सब देख रहा है।
मुसलमान कूं गाय भखी, हिन्दू खाया सूर,
गरीबदास तुम दोनवो से, राम रहीमा दूर।
ब्राह्मण हिन्दू देव है, और मुल्ला मुसल का पीर,
गरीबदास उस स्वर्ग में, तुम दोनों को हो तकसीर।
काजी पढ़ै कुरान कूं, मुझे अंदेशा ओर,
गरीबदास उस स्वर्ग/दरबार में, नहीं खूनी को ठौर।
सुन मुल्ला तू मिलेगा, उस नरक के माहीं,
गरीबदास लख अर्ज करियो, मुल्ला छूटैं नाहीं।
लाख अर्ज मुल्ला करियो, चाहे काजी करियो करोड़,
गरीबदास वहाँ कोई नहीं संगी, मत झोटे बकरे तोड़।
गरीब, मुर्गे सिर कलंगी होती, चिसमें लाल चलूल,
गरीबदास उस कलंगी का, कहाँ गया वो फूल।
परमात्मा ने कितना सुन्दर मुर्गा बना रखा है, कितनी सुन्दर उसके सिर पर कलंगी ला रही थी और तुमने उसे काट-पीट कर कण्डम कर दिया, उसे बिगाड़ दिया।
सुन मुल्ला माली अलह, ये फूल रुप संसार,
गरीबदास गति एक सब, पान फूल फल डार।
परमात्मा काजी मुल्लाओं को समझाते हुए कह रहे है कि जैसे माली एक बगीचा लगाता है वैसे ही यह पूरा संसार एक माली(परमात्मा) का बाग है और उसने बड़े प्यार से इसे सींचा हुआ है। जब माली का कोई एक फल, एक टहनी या एक पौधा भी कोई तोड़ लेता है तो उस माली को बहुत दुख होता है वह उस व्यक्ति से प्यार नहीं करता। उसी प्रकार तुमने एक मुर्गा भी उस मालिक का मार दिया तो तुम्हारी खैर नहीं है।
फिर परमात्मा ने बताया कि ये खाना खाया करो...
"बासमती चावल पकै, घृत खांड टूक डार,
गरीबदास करो बन्दगी, ये कूढ़े काम निवार"।
"फुलके धोवा डाल कर, हलवा मिठी खा,
गरीबदास काजी सुन ये, माँस मिट्टी मत खा"।
गरीब, मुल्ला से पंडित भये, पंडित से भये मुल्ल,
गरीबदास तज् बैर भाव, तुम करलो सुल्लम सुल्ल।
परमात्मा ने कहा कि द्वापर से पहले कोई पंथ मजहब नहीं था इसलिए आपके संस्कार आपस में मिले-जुले है। आज कोई मुल्ला है वह अगले जन्म में पंडित भी हो सकता है और जो आज पंडित है वह अगले जन्म में मुल्ला भी बन सकता है इसलिए अभी से तुम अपना प्यार बना लो, बैर भाव त्याग दो, बुराइयाँ छोड़ दो और एक परमात्मा की भक्ति कर लो।
गरीब काजी खिलस उठाय ले, तज् रोजे की रीत,
गरीबदास अल्लाह भजो, यों समय जावेगा बीत।
परमात्मा ने कहा कि ये गलत साधनाएं त्याग दो और उस एक अल्लाह/परमात्मा की भक्ति करो अन्यथा यह मनुष्य जीवन का अनमोल समय हाथ से निकल जायेगा।
"हिन्दू मुसलमान के बीच में, मेरा नाम कबीर,
आत्म उद्धार कारणै, अविगत धरा शरीर"॥
सत् साहिब जी।
परमेश्वर बन्दीछोड़ सदगुरु रामपाल जी महाराज की सदैव जय हो॥

गुरुवार, 28 मई 2015

देवी-देवताओं का राजा इन्द्र भी गधा बनता है

👉देवी-देवताओं का राजा इन्द्र भी गधा बनता है

एक समय मार्कण्डे ऋषि निरंकार ईश्वर मान कर ब्रह्म (काल) की कई वर्षों से साधना कर रहे थे। 
इन्द्र (जो स्वर्ग का राजा है) को चिंता बनी कि कहीं यह साधकअधिक तप करके इन्द्र की पदवी प्राप्त न करले।
चूंकि इन्द्र की पदवी (पोस्ट) अधिक यज्ञ करके या अधिक तप करके प्राप्त की जाती है। उसका (इन्द्र का) शासन काल बहत्तर चैकड़ी (चतुर्युगी) युग का होता है।
उसके शासन काल के दौरान यदि कोई साधक इन्द्र की पदवी पाने योग्य साधना कर लेता है
तो उस वर्तमान इन्द्र (स्वर्ग के राजा) को बीच में ही पद से हटा कर नए साधक को इन्द्र पद दे दिया जाता है। इसलिए इन्द्र को यह चिंता बनी रहती है कि कोई तप या यज्ञ करके मेरे राज्य को न छीन ले। इसलिए वह उस साधक का तप या यज्ञ बीच में खण्ड करवादेता है।इसी उद्देश्य से इन्द्र ने मार्कण्डे ऋषि के पास
एक उर्वसी स्वर्ग से भेजी। उर्वसी ने अपनी सिद्धि शक्ति से सुहावना मौसम बनाया तथा खूब नाची-गाई। अंत में निवस्त्र हो गई। तब मार्कण्डे ऋषि ने कहा कि
हे बहन! हे बेटी! हे माई! आप यहाँ किस लिए आई? इस पर उर्वसी ने कहा कि हे मार्कण्डे गुसांई!
आप जीत गए मैं हार गई। आप एक बार इन्द्र लोक में चलो नहीं तो मेरा मजाक करेंगे
और मुझे सजा दी जाएगी।
मार्कण्डे बोले मैं जहाँ की साधना (महास्वर्ग-ब्रह्म लोक की साधना) कररहाहूँ वहाँ पर जो नाचने वाली तथा गाने वाली हैं उनके पैर धोने वाली तेरे जैसी सात-सात बान्दियाँहैं। फिर तेरे को क्या देखूं।
तेरे से अगली कोई अधिक सुन्दर हो उसे भेज दे।
इस पर उर्वसी ने कहा कि इन्द्र की पटरानी मैं ही हूँ अर्थात् मेरे से सुन्दर कोई नहीं है।
इस पर मार्कण्डे गोंसाई बोले कि जब इन्द्र मरेगा तब क्या करेगी?
उर्वसी बोली मैं चौदह इन्द्र वरूंगी अर्थात् मैं तो एक बनी रहूँगी मेरे सामने (14) चैदह इन्द्र अपनी-अपनी इन्द्र पदवी भोग कर मर जाएंगे। मेरी आयु स्वर्ग की पटरानी के रूप में है।
(72 गुणा 14 = 1008 चतुर्युग तक अर्थात्
एक ब्रह्मा के दिन(एक कल्प) की आयु एक इन्द्र की पटरानी शची की है। मार्कण्डेऋषि बोले चैदह इन्द्र भी मरेंगे तब क्या करेगी?
उर्वसी बोली जितने इन्द्र मैं भोगुंगी वे गधे बनेंगे तथा मैडं गधी बनूंगी।
गरीब दास जी कहते है -
एती उम्र, बुलंद मरेगा अंत रे।
सतगुरु लगे न कान,
न भेटैं संत रे।।
फिर इन्द्र आया तथा कहने लगा कि हे बन्द निवाज!
आप जीत गए हम हार गए। चलो इन्द्र की गद्दी प्राप्त करो। इस पर मार्कण्डे ऋषि बोले- रे-रे इन्द्र क्या कहरहा है?
इन्द्र का राज मेरे किस काम का। मैं तो ब्रह्म लोक की साधना कर रहा हूँ।
वहाँ पर तेरे जैसे इन्द्र अलिलों (नील संख्या) में हैं उन्होंने मेरे चरणछुए। तू भी अनन्य मन से (नीचे की साधना - ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा देवी-देवताओं का त्याग करने को अनन्य मन कहते हैं) ब्रह्म की साधना कर ले। ब्रह्म लोक में साधक कल्पों तक मुक्त हो जाता है।
इस पर इन्द्र नेकहा ऋषि जी, फिर कभी देखेंगे। अब तो मौज मारने दो।
यहाँ विशेष विचारने की बात है कि इन्द्र जी को मालूम है कि इस क्षणिक स्वर्ग के राज का सुख भोग कर गधा बनुंगा। फिर भी मन व इन्द्रियों के वश हुआ विकारों के आनन्द को नहीं त्यागना चाहता।
इसी प्रकार जो शराब पीता है उसे उत्तम मान कर त्यागना नहीं चाहता।
इसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव भी अपनी पदवी को भोग कर मर जाएंगेऔर फिर चैरासी लाख योनियों को प्राप्त होगें।
नई श्रेष्ठ (परम) आत्मा काल निरंजन के घर प्रकृति (अष्टंगी) के उदरसे जन्म लेती है तथा उन्हें फिर तीन लोक का राज्य दे देता है- ब्रह्मा को शरीर बनाना, विष्णु को स्थिति और शिव को संहार (प्रलय)।
चूंकि काल (ब्रह्म) शापवश प्रतिदिन एक लाख (मनुष्य-देव-ऋषि)शरीर धारी प्राणी खाता है। उसके लिए इसके तीनों पुत्र व्यवस्था बनाए रखते हैं।
आदरणीय
गरीबदास साहेब जी कह रहे हैं कि हे नादान मन! असंख्यों जन्म हो गए इस काल लोक में कष्ट उठाते। अब जीवित मर ले।
जीवित मरना है - न पृथ्वी के राज की चाह, न स्वर्ग के राज की, न ब्रह्मा विष्णु-शिव बनने की चाह, न शराब-तम्बाखू-सुल्फा, न अफीम, न माँस प्रयोग की इच्छा तथा तीन लोक व ब्रह्म लोक की साधना को त्याग कर
उस पूर्ण परमात्मा (पूर्णब्रह्म सतपुरुष) की साधना अनन्य (अव्याभिचारिणी)भक्ति करके सतलोक (सच्चखण्ड) चला जा। फिर तेरा जन्म-मरण सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण पवित्रा गीता जीके अध्याय 13 में तथा रह-रह कर प्रत्येक अध्याय में दिया है।
फिर कहा है कि कोई पूर्ण संत (सतगुरु) मिले तो सही ज्ञान (जो गीता जी के अध्याय13 पूरे में है) बता कर उत्तम साधना सतनाम तथा सारनाम दे कर पार करे।
जहाँ (सतलोक में) चार मुक्ति जो ब्रह्म साधना की अंतिम उपलब्धि है वहाँ (सतलोक के) केे स्थाई सुख के सामने तुच्छ है तथा माया (सर्व सुविधा देने वाली)
वहाँ आम भक्त (हंस) की सेवक है। अर्थात् हर सुविधा तथा सुख चरणों में पड़ा रहता है। इन्द्र का स्वर्ग राज, सतलोक की तुलना में कौवे की बीट (टटी) के समान है।
अविनाशी (परम अक्षर ब्रह्म) की प्राप्ति हो जाएगी। उस को प्राप्त करके पूर्ण मुक्त (परम गति को प्राप्त) हो जाएगा।

सभी 12 कबीर पन्थो के लिए सन्देश


सभी 12 कबीर पन्थो के लिए सन्देश -

सत साहेब जी ....
आप सभी अच्छी तरह से जानते है की 13वां पंथ स्वयं सत्पुरुष सद्गुरु सत कबीर जी स्वयं आकर चलाएंगे ... इस समय 13पंथ चल रहा है ... इसका मतलब की परमेश्वर सत कबीर जी की भविष्वाणी सिद्ध हो चुकी है ...यानी परमेश्वर सतगुरु सत कवीर जी रूप बदल कर आ चुके है ...हमने तो पहचान लिया है .और शरण मालिक की आ गये है ... आप जी भी बिना देर किये सद्गुरु परमेश्वर की शरण ग्रहण करो ... उनका विरोध कर और स्वयं को ही 13वां पंथ घोषित कर पापी मत बनो ....वैसे परमेश्वर सद्गुरु कबीर साहेब जी ने ये भी कहा था की सभी पंथों को मिटा के एक ही पंथ चलाएंगे ... आप स्वयं आसानी से आ जायेंगे .. तो महापुण्य बनेंगे ...नही तो इतिहास गवाह है की जो नही माने है उनका हश्र कितना बुरा हुआ है ... सभी सच्चे ज्ञान के रस्ते चलते हुए अभिमान त्यागकर 13वे कबीर पंथ में परमेश्वर सद्गुरु रामपाल जी के शरण में आजाओ ... इस समय 13वे पंथ में परमेश्वर सद्गुरु कबीर जी का नाद रूप संत रामपाल जी ही है .... ज्ञान के आधार पर सत्य पहचानो ...आपना कल्याण करो .. ये समय मृत्यु लोक से मुक्ति का है,,,, जिसके हाथ से ये समय निकल गया उसे ये समय अगले कल्प में ही मिलेगा जब तक अरबो खरबों जन्म कष्ट भोगना पड़ेगा... आगे आपकी मर्जी है ... ....[[[ परमेश्वर सभी का ज्ञान योग खोले ]]]

सौजन्य से

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बुधवार, 20 मई 2015

अहंकार तज परमेश्वर को पहचान लो .... शिक्षा लो इस कथा से

सत साहेब जी 
कभी कभी इन्सान अपने अंहकार के वशीभूत होकर अपना बुरा और दूसरों का भला करा लेता है 
समय होता है उसके पास अगर गुरु के चरण पकड ले और क्षमा मांग ले अपने गुनाहों कि तो उसका भी भला हो सकता है और भाग जाए तो फिर अपनी हानी
सिखों के गुरु गुरु हरि क्रिष्ण राय जी महाराज जब आनंदपूर से दिल्ली के लिए चले तो उस समय सभी यात्राएं पैदल होती थी सो गुरुजी जब अंबाला के पास पहुंचे तो शाम हो चुकि थी सो भक्तों ने कहा महाराज आज यहीं विश्राम करते हैं और सुबह उठकर चलेंगे यहाँ से सो गुरुजी ने कहा कि कोई बात नहीँ यहाँ तो रुकना ही पडेगा क्यूंकि एक भक्त जो है वो बहुत दिनों से आस लगाए बैठे हैं और हमारा इंतजार कर रहे हैं तो भक्तों ने पुछा महाराज यहाँ तो कोई दिखता नही कहाँ हैं वो भगत आपका तो गुरुजी ने कहा भगतो बैठ जाओ और आगे आगे देखो होता है क्या ।
तो उस गांव मे एक पंडित जी रहते थे उन्होंने गीता का एक एक श्लोक ऐसे रट रखा था जैसे तोता बोलता है तो उसे बडा घमंड है अपने ज्ञान पर तो जब उसे पता चला कि यहाँ सिखों के गुरु आए हैं तो वो आ गया गुरुजी की परिक्षा लेने।
बोले महाराज आप हैं कौन जो इतनी उंचाई पर बैठे हो गीता का ज्ञान है आपको गुरुजी ने कहा रे भोले प्राणी पहले अपने बारे मे तो बता तु कौन है तो पंडीत बोला रे पाखंडी तुझे मालुम ना है मै फलाना पंडीत हूँ दूनीया जाणे सैं मनै तू गुरु बण्या बैठा है मनै कोनी जाणता तू बावला है के तू तो गुरुजी ने कहा भाई कोई बात नहीँ इब समझ लिया तनै इब समस्या ते बता दे के समस्या सैं भाई तू बिना कारण घणा नाराज होण लाग रहेया सैं इब पंडीत कहण लागेया भाई तनै गीता का ज्ञान सैं मै ज्ञान चर्चा करने आया हूँ ।
तो गुरुजी ने कहा तू किसका उपासक है किसकि पुजा करता है तो पंडित बोला मै क्रिष्ण का पुजारी हूँ वही मेरे सब कुछ है तो गुरुजी ने कहा पंडित जी ऐसा है मै तो इन झमेलों मे नहीं पडता तू ही कोई बंदा पकड ला अपने गांव से उससे ही तेरी चर्चा करवा देंगे अगर मैं ज्ञान चर्चा करुंगा तो तु कहेगा गुरु पुत्र है सारा ज्ञान घोट रखा है और जो मेरे भगत भाई साथ हैं ये आपसे ज्ञान चर्चा करेंगे नहीं थके हूए हैं तो तू ऐसा कर अपने गांव से कोई पकड ला
अब पंडीत ने सोचा अछा समय है गुरु को हराने का गुरु को हरा दुंगा तो मेरे नाम का और डंका बजेगा मुझे और ख्याती मीलेगी सिख लोग भी खुब इजत करेंगे सो चल पकड ला ऐसा बंदा जीसे कुछ आता नहीं जीसने कभी स्कुल न देखा हो
वो अभी गांव के बाहर ही पहुंचा था तो सामने से एक गंगू तेली नाम का आदमी सामने आ गया उसे देखते ही पंडीत ने दो फुट उंची छलांग लगाई पंडीत की खुशी का ठिकाना नहीं था बोले आज तो जीत ही जीत है गंगू गूंगा है मुह से कुछ बोलता नहीँ आज देखता हूँ गुरु को ये गुरु होता क्या है वेवकूफ बना रखा है इसने लोगों को आज नहीं छोडूंगा आज तो जीत पकी सो ले चला पंडित गंगू तेली को गुरु के पास
गुरु के पास जब पंडीत पहुंचा तो कहने लगा महाराज ये बंदा लाया हूँ इससे करवाओ मेरी ज्ञान चर्चा मै श्लोक बोलूंगा और ये उनको समझाएगा की इसका भेद क्या है ।
गुरुजी तो जाणे जाण थे सो पंडित से बोले भाई आप बैठो अभी इसे स्नान करने दो फिर करेंगे चर्चा आराम से पंडित के मन मे तो दो दो लडू फुट रहेथे कि कब हो ज्ञान चर्चा औऱ जीतकर घर जाएं
अब गुरुजी ने उस गुंगे को स्नान करवाया और दोनो को अपने सामने बिठा लीया एक छडी लेकर गुरुजी ने गुंगे के सीर पर मारी और पंडित से कहा कि अब पुछो जो पुछना है बस पंडित जी हो गए शुरु एक श्लोक सुनाया और उसका उतर देने को कहा जैसे ही पंडीत ने श्लोक खत्म किया गंगू तेली फटाफट करने लगा आंसर पंडित ये देखकर पागल हो गया की ये तो जन्मजात गूंगा था ये बोला कैसे उसे सारे श्लोक ही भुल गए तो गंगू ने कहा पंडित जी अगला श्लोक बोलो पर पंडित चूप कुछ ना सुझा परेशानहो गया माथा पिटने लगा और गंगू श्लोक पर श्लोक सुनाए जा रहा था एक से एक अब पंडित ने देखा ये तो मामला ही उल्ट हो गया इससे पहले की और बेइजती हो तू खिसक जा बची हुई इजत बचा ले बाबा वर्ना लोग जूते मारेंगे और ये सोचकर भाग खडा हुआ और गंगू तेली गुरुजी के चरणों मे गीर पडा महाराज कहाँ थे आप आज तक आंखे भी पथरा गई महाराज आपने क्रिपा करी दाता सब कुछ याद आ गई गंगू तेली को पिछले जन्मो की । गंगू तेली रो रोकर गुरु के चरणो को धो रहे थे औऱ पंडीत भाग खडा हुआ सो गुरुजी ने संगत से कहा भगत जनो ये मेरा भक्त था इसके लीए रुकना पडा यहाँ पर तो ऐसे होते हैं महापुरुष अगर पंडित माफी मांग लेता चरणो मे गीर जाता तो उसका भी कल्याणहो जाता पर मान बडाई के चकर मे भाग गया तो पुण्य आत्माओं ऐसे महापुरुष जहाँ मील जाएं उनके चरण धोकर पि लो सारे ब्रम्हांड के रास्ते खुल जाएंगे आपके लीए ।
सत साहेब जी
जय हो गुरुदेव जी की

शनिवार, 16 मई 2015

skills

विज्ञान के अधिकतर अविष्कार अल्प शिक्षित व्यक्तियों ने किये ।

संसार का अधिकतर धन अल्प शिक्षित व्यक्तियों के पास है।


संसार के अधिकतर शिक्षित व्यक्ति अल्प शिक्षित व्यक्तियों के यहाँ 


नौकरी करते है।

संसार के अधिकतर शासक अल्प शिक्षित है।


आजादी के दीवाने भी अधिक शिक्षित नही थे।


परमात्मा जिन जिन को मिले उनकी संसारिक शिक्षा भी अधिक नहीं थी।


फिर अधिक पढ़े लिखे लोग किस बात का अभिमान करते है

बुधवार, 13 मई 2015


,धर्मराज एम्पायर ,
कर्मो के इस आयोजन में ,
विकेट कीपर यमराज है।
प्राण हमारे विकेट है ,
जीवन एक क्रिकेट है।
आओ कुछ नया कीर्तिमान बना ले,
अब तक हारते रहने का रिकार्ड तोड़ दे।
सांसो का सिमित ओवर है
साधना, सुमिरन के रन बना ले।
संयम (सेवा)की सावधानी से चलना है।,
दुर्घटना(संशय )के रन आउट से बचना ,
गुरु घर से अलग होने का हिट विकेट कभी न देना,
वैसे कुछ खिलाडी
जल्दी पवेलियन लौट जाते है,
पर पारी ऐसे खेलते है
की कीर्तिमान रच जाते है।
🏃🏃🏃🏃🏃

सोमवार, 11 मई 2015

life as a match , play like this

written by - Chandrashekhar Dass

,धर्मराज एम्पायर ,
कर्मो के इस आयोजन में ,
विकेट कीपर यमराज है।
प्राण हमारे विकेट है ,
जीवन एक क्रिकेट है।
आओ कुछ नया कीर्तिमान बना ले,
अब तक हारते रहने का रिकार्ड तोड़ दे।
सांसो का सिमित ओवर है
साधना, सुमिरन के रन बना ले।
संयम (सेवा)की सावधानी से चलना है।,
दुर्घटना(संशय )के रन आउट से बचना ,
गुरु घर से अलग होने का हिट विकेट कभी न देना,
वैसे कुछ खिलाडी
जल्दी पवेलियन लौट जाते है,
पर पारी ऐसे खेलते है
की कीर्तिमान रच जाते है।
🏃🏃🏃🏃🏃

शनिवार, 7 मार्च 2015

परमपिता परमेश्वर की भक्ति करने वालो की लिए महत्वपूर्ण सन्देश

परमपिता परमेश्वर  की भक्ति करने वालो की लिए महत्वपूर्ण सन्देश 

पूर्ण गुरु की पहचान
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
आज कलियुग में भक्त समाज के सामने पूर्ण गुरु की पहचान करना सबसे जटिल प्रश्न बना हुआ है। लेकिन इसका बहुत ही लघु और साधारण–सा उत्तर है कि जो गुरु शास्त्रो के अनुसार भक्ति करता है और अपने अनुयाईयों अर्थात शिष्यों द्वारा करवाता है वही पूर्ण संत है। चूंकि भक्ति मार्ग का संविधान धार्मिक शास्त्र जैसे – कबीर साहेब की वाणी, नानक साहेब की वाणी, संत गरीबदास जी महाराज की वाणी, संत धर्मदास जी साहेब की वाणी, वेद, गीता, पुराण, कुरआन, पवित्र बाईबल आदि हैं। जो भी संत शास्त्रो के अनुसार भक्ति साधना बताता है और भक्त समाज को मार्ग दर्शन करता है तो वह पूर्ण संत है अन्यथा वह भक्त समाज का घोर दुश्मन है जो शास्त्रो के विरूद्ध साधना करवा रहा है। इस अनमोल मानव जन्म के साथ खिलवाड़ कर रहा है। ऐसे गुरु या संत को भगवान के दरबार में घोर नरक में उल्टा लटकाया जाएगा।
उदाहरण के तौर पर जैसे कोई अध्यापक सलेबस (पाठयक्रम) से बाहर की शिक्षा देता है तो वह उन विद्यार्थियों का दुश्मन है।
गीता अध्याय नं. 7 का श्लोक नं. 15
न, माम्, दुष्कतिनः, मूढाः, प्रपद्यन्ते, नराधमाः,
मायया, अपहृतज्ञानाः, आसुरम्, भावम्, आश्रिताः।।
अनुवाद: माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर स्वभावको धारण किये हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करनेवाले मूर्ख मुझको नहीं भजते अर्थात् वे तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव) की साधना ही करते रहते हैं।
यजुर्वेद अध्याय न. 40 श्लोक न. 10 (संत रामपाल दास जी द्वारा भाषा-भाष्य)
अन्यदेवाहुःसम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्, इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।।10।।
हिन्दी अनुवाद:- परमात्मा के बारे में सामान्यत निराकार अर्थात् कभी न जन्मने वाला कहते हैं। दूसरे आकार में अर्थात् जन्म लेकर अवतार रूप में आने वाला कहते हैं। जो टिकाऊ अर्थात् पूर्णज्ञानी अच्छी प्रकार सुनाते हैं उसको इस प्रकार सही तौर पर वही समरूप अर्थात् यथार्थ रूप में भिन्न-भिन्न रूप से प्रत्यक्ष ज्ञान कराते हैं।
गीता अध्याय नं. 4 का श्लोक नं. 34
तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया,
उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्वदर्शिनः।।
अनुवाद: उसको समझ उन पूर्ण परमात्मा के ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतोंको भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे उनकी सेवा करनेसे और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे परमात्म तत्व को भली भाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञानका उपदेश करेंगे।
नशीली वस्तुओं का सेवन निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
हुक्का, शराब, बीयर, तम्बाखु, बीड़ी, सिगरेट, हुलास सुंघना, गुटखा, मांस, अण्डा, सुल्फा, अफीम, गांजा और अन्य नशीली चीजों का सेवन तो दूर रहा किसी को नशीली वस्तु लाकर भी नहीं देनी है। बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज इन सभी नशीली वस्तुओं को बहुत बुरा बताते हुए अपनी वाणी में कहते हैं कि -
सुरापान मद्य मांसाहारी, गमन करै भोगैं पर नारी। सतर जन्म कटत हैं शीशं, साक्षी साहिब है जगदीशं।।
पर द्वारा स्त्री का खोलै, सतर जन्म अंधा होवै डोलै। मदिरा पीवै कड़वा पानी, सत्तर जन्म श्वान के जानी।।
गरीब, हुक्का हरदम पिवते, लाल मिलावैं धूर। इसमें संशय है नहीं, जन्म पिछले सूर।।1।।
गरीब, सो नारी जारी करै, सुरा पान सौ बार। एक चिलम हुक्का भरै, डुबै काली धार।।2।।
गरीब, सूर गऊ कुं खात है, भक्ति बिहुनें राड। भांग तम्बाखू खा गए, सो चाबत हैं हाड।।3।।
गरीब, भांग तम्बाखू पीव हीं, सुरा पान सैं हेत। गौस्त मट्टी खाय कर, जंगली बनें प्रेत।।4।।
गरीब, पान तम्बाखू चाब हीं, नास नाक में देत। सो तो इरानै गए, ज्यूं भड़भूजे का रेत।।5।।
गरीब, भांग तम्बाखू पीव हीं, गोस्त गला कबाब। मोर मग कूं भखत हैं, देगें कहां जवाब।। 6।।
तीर्थ स्थानों पर जाना निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
किसी प्रकार का कोई व्रत नहीं रखना है। कोई तीर्थ यात्रा नहीं करनी, न कोई गंगा स्नान आदि करना, न किसी अन्य धार्मिक स्थल पर स्नानार्थ व दर्शनार्थ जाना है। किसी मन्दिर व ईष्ट धाम में पूजा व भक्ति के भाव से नहीं जाना कि इस मन्दिर में भगवान है। भगवान कोई पशु तो है नहीं कि उसको पुजारी जी ने मन्दिर में बांध रखा है। भगवान तो कण–कण में व्यापक है। ये सभी साधनाएँ शास्त्रो के विरुद्ध हैं।
ऐसे संतों की तलाश करो जो शास्त्रो के अनुसार पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की भक्ति करते व बताते हों। फिर जैसे वे कहे केवल वही करना, अपनी मन मानी नहीं करना।
सामवेद संख्या नं. 1400 उतार्चिक अध्याय नं. 12 खण्ड नं. 3 श्लोक नं. 5(संत रामपाल दास द्वारा भाषा-भाष्य) :-
भद्रा वस्त्रा समन्या3वसानो महान् कविर्निवचनानि शंसन्।
आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागविर्देववीतौ।।5।।
हिन्दी:- चतुर व्यक्तियों ने अपने वचनों द्वारा पूर्ण परमात्मा (पूर्ण ब्रह्म) की पूजा का सत्यमार्ग दर्शन न करके अमत के स्थान पर आन उपासना (जैसे भूत पूजा, पितर पूजा, श्राद्ध निकालना, तीनों गुणों की पूजा (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शंकर) तथा ब्रह्म-काल की पूजा मन्दिर-मसजिद-गुरूद्वारों-चर्चों व तीर्थ-उपवास तक की उपासना) रूपी फोड़े व घाव से निकले मवाद को आदर के साथ आचमन करा रहे होते हैं। उसको परमसुखदायक पूर्ण ब्रह्म कबीर सहशरीर साधारण वेशभूषा में (‘‘वस्त्रा का अर्थ है वेशभूषा-संत भाषा में इसे चोला भी कहते हैं। जैसे कोई संत शरीर त्याग जाता है तो कहते हैं कि महात्मा तो चोला छोड़ गए।‘‘) सत्यलोक वाले शरीर के समान दूसरा तेजपुंज का शरीर धारण करके आम व्यक्ति की तरह जीवन जी कर कुछ दिन संसार में रह कर अपनी शब्द-साखियों के माध्यम से सत्यज्ञान को वर्णन करके पूर्ण परमात्मा के छुपे हुए वास्तविक सत्यज्ञान तथा भक्ति को जाग्रत करते हैं।
गीता अध्याय नं. 16 का श्लोक नं. 23
यः, शास्त्रविधिम्, उत्सज्य, वर्तते, कामकारतः, न, सः,
सिद्धिम्, अवाप्नोति, न, सुखम्, न, पराम्, गतिम्।।
अनुवाद: जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह न सिद्धि को प्राप्त होता है न परम गति को और न सुख को ही।
गीता अध्याय नं. 6 का श्लोक नं. 16
न, अति, अश्र्नतः, तु, योगः, अस्ति, न, च, एकान्तम्,
अनश्र्नतः, न, च, अति, स्वप्नशीलस्य, जाग्रतः, न, एव, च, अर्जुन।।
अनुवाद: हे अर्जुन! यह योग अर्थात् भक्ति न तो बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल न खाने वाले का न एकान्त स्थान पर आसन लगाकर साधना करने वाले का तथा न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
पूजैं देई धाम को, शीश हलावै जो। गरीबदास साची कहै, हद काफिर है सो।।
कबीर, गंगा काठै घर करै, पीवै निर्मल नीर। मुक्ति नहीं हरि नाम बिन, सतगुरु कहैं कबीर।।
कबीर, तीर्थ कर-कर जग मूवा, उडै पानी न्हाय। राम ही नाम ना जपा, काल घसीटे जाय।।
गरीब, पीतल ही का थाल है, पीतल का लोटा। जड़ मूरत को पूजतें, आवैगा टोटा।।
गरीब, पीतल चमच्चा पूजिये, जो थाल परोसै। जड़ मूरत किस काम की, मति रहो भरोसै।।
कबीर, पर्वत पर्वत मैं फिर्या, कारण अपने राम। राम सरीखे जन मिले, जिन सारे सब काम।।
पितर पूजा निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
किसी प्रकार की पितर पूजा, श्राद्ध निकालना आदि कुछ नहीं करना है। भगवान श्री कृष्ण जी ने भी इन पितरों की व भूतों की पूजा करने से साफ मना किया है। गीता जी के अध्याय नं. 9 के श्लोक नं. 25 में कहा है कि -
यान्ति, देवव्रताः, देवान्, पितऋन्, यान्ति, पितव्रताः।
भूतानि, यान्ति, भूतेज्याः, मद्याजिनः, अपि, माम्।
अनुवाद: देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मतानुसार पूजन करने वाले भक्त मुझसे ही लाभान्वित होते हैं।
बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज और कबीर साहिब जी महाराज भी कहते हैं ।
‘गरीब, भूत रमै सो भूत है, देव रमै सो देव। राम रमै सो राम है, सुनो सकल सुर भेव।।‘‘
इसलिए उस(पूर्ण परमात्मा) परमेश्वर की भक्ति करो जिससे पूर्ण मुक्ति होवे। वह परमात्मा पूर्ण ब्र सतपुरुष(सत कबीर) है। इसी का प्रमाण गीता जी के अध्याय नं. 18 के श्लोक नं. 46 में है।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।46।।
अनुवाद: जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त हो जाता है।।63।।
गीता अध्याय नं. 18 का श्लोक नं. 62:--
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।62।।
अनुवाद: हे भरतवंशोभ्द्रव अर्जुन! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परम शान्ति (संसारसे सर्वथा उपरति) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।
सर्वभाव का तात्पर्य है कि कोई अन्य पूजा न करके मन-कर्म-वचन से एक परमेश्वर में आस्था रखना।
गीता अध्याय नं. 8 का श्लोक नं. 22:--
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।22।।
अनुवाद: हे पृथानन्दन अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है।
अनन्य भक्ति का तात्पर्य है एक परमेश्वर (पूर्ण ब्रह्म) की भक्ति करना, दूसरे देवी-देवताओं अर्थात् तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव) की नहीं। गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1 से 4:--
गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1
ऊध्र्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्,
छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित्।।1।।
अनुवाद: ऊपर को जड़ वाला नीचे को शाखा वाला अविनाशी विस्तृत संसार रूपी पीपल का वृक्ष है, जिसके छोटे-छोटे हिस्से या टहनियाँ, पत्ते कहे हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो इस प्रकार जानता है। वह पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी है।
गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 2
अधः, च, ऊध्र्वम्, प्रसृताः, तस्य, शाखाः, गुणप्रवृद्धाः, विषयप्रवालाः,
अधः, च, मूलानि, अनुसन्ततानि, कर्मानुबन्धीनि, मनुष्यलोके।।2।।
अनुवाद: उस वृक्षकी नीचे और ऊपर तीनों गुणों ब्रह्मा-रजगुण, विष्णु-सतगुण, शिव-तमगुण रूपी फैली हुई विकार काम क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी कोपल डाली ब्रह्मा, विष्णु, शिव ही जीवको कर्मोमें बाँधने की भी जड़ें अर्थात् मूल कारण हैं तथा मनुष्यलोक, स्वर्ग, नरक लोक पृथ्वी लोक में नीचे (चैरासी लाख जूनियों में) ऊपर व्यस्थित किए हुए हैं।
गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 3
न, रूपम्, अस्य, इह, तथा, उपलभ्यते, न, अन्तः, न, च, आदिः, न, च,
सम्प्रतिष्ठा, अश्वत्थम्, एनम्, सुविरूढमूलम्, असङ्गशस्त्रोण, दढेन, छित्वा।। 3।।
अनुवाद: इस रचना का न शुरूवात तथा न अन्त है न वैसा स्वरूप पाया जाता है तथा यहाँ विचार काल में अर्थात् मेरे द्वारा दिया जा रहा गीता ज्ञान में पूर्ण जानकारी मुझे भी नहीं है क्योंकि सर्वब्रह्मण्डों की रचना की अच्छी तरह स्थिति का मुझे भी ज्ञान नहीं है इस अच्छी तरह स्थाई स्थिति वाला मजबूत स्वरूपवाले निर्लेप तत्वज्ञान रूपी दढ़ शस्त्र से अर्थात् निर्मल तत्वज्ञान के द्वारा काटकर अर्थात् निरंजन की भक्ति को क्षणिक जानकर। (3)
गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 4
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रतत्ति प्रसता पुराणी।।4।।
अनुवाद: उसके बाद उस परमपद परमात्मा की खोज करनी चाहिये। जिसको प्राप्त हुए मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तारको प्राप्त हुई है, उस आदि पुरुष परमात्माके ही मैं शरण हूँ।
इस प्रकार स्वयं भगवान श्री कृषण ने इन्द्र जो देवी-देवताओं का राजा है कि पूजा भी छुड़वा कर उस परमात्मा की भक्ति करने के लिए ही प्रेरणा दी थी। जिस कारण उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठा कर इन्द्र के कोप से ब्रज वासियों की रक्षा की।
गरीब, इन्द्र चढ़ा ब्रिज डुबोवन, भीगा भीत न लेव।
इन्द्र कढाई होत जगत में, पूजा खा गए देव।।
कबीर, इस संसार को, समझाऊँ कै बार।
पूँछ जो पकड़ै भेढ की, उतरा चाहै पार।।
गुरु आज्ञा का पालन
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
जी की आज्ञा के बिना घर में किसी भी प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान नहीं करवाना है। जैसे बन्दी छोड़ अपनी वाणी में कहते हैं कि:-
”गुरु बिन यज्ञ हवन जो करहीं, मिथ्या जावे कबहु नहीं फलहीं।“
कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।।
माता मसानी पूजना निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
आपने खेत में बनी मंढी या किसी खेड़े आदि की या किसी अन्य देवता की समाध नहीं पूजनी है। समाध चाहे किसी की भी हो बिल्कुल नहीं पूजनी है। अन्य कोई उपासना नहीं करनी है। यहाँ तक कि तीनों गुणों(ब्रा, विष्णु, शिव) की पूजा भी नहीं करनी है। केवल गुरु जी के बताए अनुसार ही करना है।
गीता अध्याय नं. 7 का श्लोक नं. 15
न, माम्, दुष्कतिनः, मूढाः, प्रपद्यन्ते, नराधमाः,
मायया, अपहृतज्ञानाः, आसुरम्, भावम्, आश्रिताः।।
अनुवाद: मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर स्वभावको धारण किये हुए मनुष्य नीच दुषित कर्म करनेवाले मूर्ख मुझको नहीं भजते अर्थात् वे तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव) की साधना ही करते रहते हैं। कबीर, माई मसानी शेढ शीतला, भैरव भूत हनुमंत। परमात्मा उनसे दूर है, जो इनको पूजंत।। कबीर, सौ वर्ष तो गुरु की सेवा, एक दिन आन उपासी। वो अपराधी आत्मा, परै काल की फांसी।। गुरु को तजै भजै जो आना। ता पसुवा को फोकट ज्ञाना।।
संकट मोचन कबीर साहेब हैं
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
कर्म कष्ट (संकट) होने पर कोई अन्य ईष्ट देवता की या माता मसानी आदि की पूजा कभी नहीं करनी है। न किसी प्रकार की बुझा पड़वानी है। केवल बन्दी छोड़ कबीर साहिब को पूजना है जो सभी दु:खों को हरने वाले संकट मोचन हैं।
सामवेद संख्या न. 822 उतार्चिक अध्याय 3 खण्ड न. 5 श्लोक न. 8 (संत रामपाल दास द्वारा भाषा-भाष्य) :-
मनीषिभिः पवते पूव्र्यः कविनर्भिर्यतः परि कोशां असिष्यदत्।
त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायुं सख्याय वर्धयन्।।8।।
हिन्दी:-सनातन अर्थात् अविनाशी कबीर परमेश्वर हृदय से चाहने वाले श्रद्धा से भक्ति करने वाले भक्तात्मा को तीन मन्त्र उपेदश देकर पवित्र करके जन्म व मृत्यु से रहित करता है तथा उसके प्राण अर्थात् जीवन-स्वांसों को जो संस्कारवश अपने मित्र अर्थात् भक्त के गिनती के डाले हुए होते हैं को अपने भण्डार से पूर्ण रूप से बढ़ाता है। जिस कारण से परमेश्वर के वास्तविक आनन्द को अपने आशीर्वाद प्रसाद से प्राप्त करवाता है।
कबीर, देवी देव ठाढे भये, हमको ठौर बताओ। जो मुझ(कबीर) को पूजैं नहीं, उनको लूटो खाओ।।
कबीर, काल जो पीसै पीसना, जोरा है पनिहार। ये दो असल मजूर हैं, सतगुरु के दरबार।।
अनावश्यक दान निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
कहीं पर और किसी को दान रूप में कुछ नहीं देना है। न पैसे, न बिना सिला हुआ कपड़ा आदि कुछ नहीं देना है। यदि कोई दान रूप में कुछ मांगने आए तो उसे खाना खिला दो, चाय, दूध, लस्सी, पानी आदि पिला दो परंतु देना कुछ भी नहीं है। न जाने वह भिक्षुक उस पैसे का दुरूपयोग करे। जैसे एक व्यक्ति ने किसी भिखारी को उसकी झूठी कहानी जिसमें वह बता रहा था कि मेरे बच्चे ईलाज बिना तड़फ रहे हैं। कुछ पैसे देने की कृपा करें को सुनकर भावनावस होकर 100 रु दे दिए। वह भिखारी पहले पाव शराब पीता था उस दिन उसने आधा बोतल शराब पीया और अपनी पत्नी को पीट डाला। उसकी पत्नी ने बच्चों सहित आत्म हत्या कर ली। आप द्वारा किया हुआ वह दान उस परिवार के नाश का कारण बना। यदि आप चाहते हो कि ऐसे दु:खी व्यक्ति की मदद करें तो उसके बच्चों को डॉक्टर से दवाई दिलवा दें, पैसा न दें।
कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुरान।।
झूठा खाना निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
ऐसे व्यक्ति का झूठा नहीं खाना है जो शराब, मांस, तम्बाखु, अण्डा, बीयर, अफीम, गांजा आदि का सेवन करता हो।
सत्यलोक गमन(देहान्त) के बाद क्रिया–कर्म निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
यदि परिवार में किसी की मौत हो जाती है, चिता में अग्नि कोई भी दे सकता है, घर का या अन्य तथा अग्नि प्रज्वलित करते समय मंगलाचरण बोल दें। तो उसके फूल आदि कुछ नहीं उठाने हैं, यदि उस स्थान को साफ करना अनिवार्य है तो उन अस्थियों को उठाकर स्वयं ही किसी स्थान पर चलते पानी में बहा दें। उस समय मंगलाचरण उच्चारण कर दें। न पिंड आदि भरवाने हैं, न तेराहमी, छः माही, बरसोधी, पिंड भी नहीं भरवाने हैं तथा श्राद्ध आदि कुछ नहीं करना है। किसी भी अन्य व्यक्ति से हवन आदि नहीं करवाना है। सम्बन्धी तथा रिश्तेदारों आदि जो शोक व्यक्त करने आए उनके लिए कोई भी एक दिन नियुक्त करें। उस दिन प्रतिदिन करने वाला नित्य नियम करें, ज्योति जागत करें, फिर सर्व को खाना खिलाऐं। यदि आपने उसके (मरने वाले के) नाम पर कुछ धर्म करना है तो अपने गुरुदेव जी की आज्ञा ले कर बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज की अमतमयी वाणी का अखण्ड पाठ करवाना चाहिए। यदि पाठ करने की आज्ञा न मिले तो परिवार के उपदेशी भक्त चार दिन या सात दिन घर में एक अखण्ड जोत देशी घी की जलाऐ तथा ब्रह्म गायत्री मन्त्र प्रतिदिन चार बार करें तथा तीन या एक बार के मन्त्र का दान संकल्प सतलोक वासी को करें। जैसा उचित समझे एक, दो, तीन तक मन्त्र के जाप का फल उसे दान करें। प्रतिदिन की तरह ज्योति व आरती, नाम स्मरण करते रहना है, यह याद रखते हुए किः-
कबीर, साथी हमारे चले गए, हम भी चालन हार। कोए कागज में बाकी रह रही, ताते लाग रही वार।। कबीर, देह पड़ी तो क्या हुआ, झूठा सभी पटीट। पक्षी उड़या आकाश कूं, चलता कर गया बीट।।
बच्चे के जन्म पर शास्त्र विरूद्ध पूजा निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
बच्चे के जन्म पर कोई छटी आदि नहीं मनानी है। सुतक के कारण प्रतिदिन की तरह करने वाली पूजा, भक्ति, आरती, ज्योति जगाना आदि बंद नहीं करनी है।
इसी संदर्भ में एक संक्षिप्त कथा बताता हूँ कि एक व्यक्ति की शादी के दस वर्ष पश्चात् पुत्र हुआ था। पुत्र की खुशी में उसने बहुत ही खुशी मनाई। बीस-पच्चीस गाँवों को भोजन के लिए आमन्त्रिात किया और बहुत ही गाना-बजाना हुआ अर्थात् काफी पैसा खर्च किया। फिर एक वर्ष के बाद उस पुत्र का देहान्त हो जाता है। फिर वही परिवार टक्कर मार कर रोता है और अपने दुर्भाग्य को कोसता है। इसलिए कबीर साहेब हमें बताते हैं कि:-
कबीर, बेटा जाया खुशी हुई, बहुत बजाये थाल। आना जाना लग रहा, ज्यों कीड़ी का नाल।।
कबीर, पतझड़ आवत देख कर, बन रोवै मन माहिं। ऊंची डाली पात थे, अब पीले हो हो जाहिं।।
कबीर, पात झडंता यूं कहै, सुन भई तरूवर राय। अब के बिछुड़े नहीं मिला, न जाने कहां गिरेंगे जाय।
कबीर, तरूवर कहता पात से, सुनों पात एक बात। यहाँ की याहे रीति है, एक आवत एक जात।।
देई धाम पर बाल उतरवाने जाना निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
बच्चे के किसी देई धाम पर बाल उतरवाने नहीं जाना है। जब देखो बाल बड़े हो गए, कटवा कर फैंक दो। एक मन्दिर में देखा कि श्रद्धालु भक्त अपने लड़के या लड़कियों के बाल उतरवाने आए। वहाँ पर उपस्थित नाई ने बाहर के रेट से तीन गुना पैसे लीये और एक कैंची भर बाल काट कर मात–पिता को दे दिए। उन्होंने श्रद्धा से मन्दिर में चढ़ाए। पुजारी ने एक थैले में डाल लिए। रात्री को उठा कर दूर एकांत स्थान पर फैंक दिए। यह केवल नाटक बाजी है। क्यों न पहले की तरह स्वाभाविक तरीके से बाल उतरवाते रहें तथा बाहर डाल दें। परमात्मा नाम से प्रसन्न होता है पाखण्ड से नहीं।
नाम जाप से सुख
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
नाम(उपदेश) को केवल दु:ख निवारण की दृष्टि कोण से नहीं लेना चाहिए बल्कि आत्म कल्याण के लिए लेना चाहिए। फिर सुमिरण से सर्व सुख अपने आप आ जाते हैं।
"कबीर, सुमिरण से सुख होत है, सुमिरण से दुःख जाए।
कहैं कबीर सुमिरण किए, सांई माहिं समाय।।"
व्यभिचार निषेध
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संत रामपाल जी महाराज
पराई स्त्री को माँ–बेटी–बहन की दृष्टि से देखना चाहिए। व्याभीचार महापाप है। जैसे:--
गरीब, पर द्वारा स्त्री का खोलै। सत्तर जन्म अन्धा हो डोलै।।
सुरापान मद्य मांसाहारी। गवन करें भोगैं पर नारी।। सत्तर जन्म कटत हैं शीशं। साक्षी साहिब है जगदीशं।।
पर नारी ना परसियों, मानो वचन हमार। भवन चर्तुदश तास सिर, त्रिलोकी का भार।।
पर नारी ना परसियो, सुनो शब्द सलतंत। धर्मराय के खंभ से, अर्धमुखी लटकंत।।
निन्दा सुनना व करना निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
अपने गुरु की निंदा भूल कर भी न करें और न ही सुनें। सुनने से अभिप्राय है यदि कोई आपके गुरु जी के बारे में मिथ्या बातें करें तो आपने लड़ना नहीं है बल्कि यह समझना चाहिए कि यह बिना विचारे बोल रहा है अर्थात् झूठ कह रहा है।
गुरु की निंदा सुनै जो काना। ताको निश्चय नरक निदाना।।
अपने मुख निंदा जो करहीं। शुकर श्वान गर्भ में परहीं।।
निन्दा तो किसी की भी नहीं करनी है और न ही सुननी है। चाहे वह आम व्यक्ति ही क्यों न हो। कबीर साहेब कहते हैं कि -
”तिनका कबहू न निन्दीये, जो पांव तले हो। कबहु उठ आखिन पड़े, पीर घनेरी हो।।“
गुरु दर्श की महिमा
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
सतसंग में समय मिलते ही आने की कोशिश करे तथा सतसंग में नखरे(मान–बड़ाई) करने नहीं आवे। अपितु अपने आपको एक बिमार समझ कर आवे। जैसे बिमार व्यक्ति चाहे कितने ही पैसे वाला हो, चाहे उच्च पदवी वाला हो जब हस्पताल में जाता है तो उस समय उसका उद्देश्य केवल रोग मुक्त होना होता है। जहाँ डॉक्टर लेटने को कहे लेट जाता है, बैठने को कहे बैठ जाता है, बाहर जाने का निर्देश मिले बाहर चला जाता है। फिर अन्दर आने के लिए आवाज आए चुपके से अन्दर आ जाता है। ठीक इसी प्रकार यदि आप सतसंग में आते हो तो आपको सतसंग में आने का लाभ मिलेगा अन्यथा आपका आना निष्फल है। सतसंग में जहाँ बैठने को मिल जाए वहीं बैठ जाए, जो खाने को मिल जाए उसे परमात्मा कबीर साहिब की रजा से प्रसाद समझ कर खा कर प्रस चित्त रहे।
कबीर, संत मिलन कूं चालिए, तज माया अभिमान। जो-जो कदम आगे रखे, वो ही यज्ञ समान।।
कबीर, संत मिलन कूं जाईए, दिन में कई-कई बार। आसोज के मेह ज्यों, घना करे उपकार।।
कबीर, दर्शन साधु का, परमात्मा आवै याद। लेखे में वोहे घड़ी, बाकी के दिन बाद।।
कबीर, दर्शन साधु का, मुख पर बसै सुहाग। दर्श उन्हीं को होत हैं, जिनके पूर्ण भाग।।
गुरु महिमा
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
यदि कहीं पर पाठ या सतसंग चल रहा हो या वैसे गुरु जी के दर्शनार्थ जाते हों तो सर्व प्रथम गुरु जी को दण्डवत्(लम्बा लेट कर) प्रणाम करना चाहिए बाद में सत ग्रन्थ साहिब व तसवीरें जैसे साहिब कबीर की मूर्ति – गरीबदास जी की व स्वामी राम देवानन्द जी व गुरु जी की मूर्ति को प्रणाम करें जिससे सिफर्ल भावना बनी रहेगी। मूर्ति पूजा नहीं करनी है। केवल प्रणाम करना पूजा में नहीं आता यह तो भक्त की श्रद्धा को बनाए रखने में सहयोग देता है। पूजा तो वक्त गुरु व नाम मन्त्र की करनी है जो पार लगाएगा।
कबीर, गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागुं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो मिलाय।।
कबीर, गुरु बड़े हैं गोविन्द से, मन में देख विचार। हरि सुमरे सो रह गए, गुरु भजे होय पार।।
कबीर, हरि के रूठतां, गुरु की शरण में जाय।कबीर गुरु जै रूठजां, हरि नहीं होत सहाय।।
कबीर, सात समुन्द्र की मसि करूं, लेखनि करूं बनिराय। धरती का कागज करूं, तो गुरु गुन लिखा न जाय।।
मांस भक्षण निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
अण्डा व मांस भक्षण व जीव हिंसा नहीं करनी है। यह महा पाप होता है। जैसे साहेब कबीर जी महाराज व गरीबदास जी महाराज ने बताया है:-
कबीर, जीव हने हिंसा करे, प्रकट पाप सिर होय। निगम पुनि ऐसे पाप तें, भिस्त गया नहिं कोय।।1।।
कबीर, तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान। काशी करौंत ले मरे, तो भी नरक निदान।।2।।
कबीर, बकरी पाती खात है, ताकी काढी खाल। जो बकरीको खात है, तिनका कौन हवाल।।3।।
कबीर, गला काटि कलमा भरे, कीया कहै हलाल। साहब लेखा मांगसी, तब होसी कौन हवाल।।4।।
कबीर, दिनको रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय। यह खून वह वंदगी, कहुं क्यों खुशी खुदाय।।5।।
कबीर, कबिरा तेई पीर हैं, जो जानै पर पीर। जो पर पीर न जानि है, सो काफिर बेपीर।।6।।
कबीर, खूब खाना है खीचडी, मांहीं परी टुक लौन। मांस पराया खायकै, गला कटावै कौन।।7।।
कबीर, मुसलमान मारैं करदसो, हिंदू मारैं तरवार। कहै कबीर दोनूं मिलि, जैहैं यमके द्वार।।8।।
कबीर, मांस अहारी मानव, प्रत्यक्ष राक्षस जानि। ताकी संगति मति करै, होइ भक्ति में हानि।।9।।
कबीर, मांस खांय ते ढेड़ सब, मद पीवैं सो नीच। कुलकी दुरमति पर हरै, राम कहै सो ऊंच।।10।।
कबीर, मांस मछलिया खात हैं, सुरापान से हेत। ते नर नरकै जाहिंगे, माता पिता समेत।।11।।
गरीब, जीव हिंसा जो करते हैं, या आगे क्या पाप। कंटक जुनी जिहान में, सिंह भेडि़या और सांप।।
झोटे बकरे मुरगे ताई। लेखा सब ही लेत गुसाईं।। मग मोर मारे महमंता। अचरा चर हैं जीव अनंता।।
जिह्वा स्वाद हिते प्राना। नीमा नाश गया हम जाना।।
तीतर लवा बुटेरी चिडि़या। खूनी मारे बड़े अगडि़या।।
अदले बदले लेखे लेखा। समझ देख सुन ज्ञान विवेका।।
गरीब, शब्द हमारा मानियो, और सुनते हो नर नारि।
जीव दया बिन कुफर है, चले जमाना हारि।।
अनजाने में हुई हिंसा का पाप नहीं लगता। बन्दी छोड़ कबीर साहिब कहते हैं:
"इच्छा कर मारै नहीं, बिन इच्छा मर जाए। कहैं कबीर तास का, पाप नहीं लगाए।।"
गुरु द्रोही का सम्पर्क निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
यदि कोई भक्त गुरु जी से द्रोह(गुरु जी से विमुख हो जाता है) करता है वह महापाप का भागी हो जाता है। यदि किसी को मार्ग अच्छा न लगे तो अपना गुरु बदल सकता है। यदि वह पूर्व गुरु के साथ बैर व निन्दा करता है तो वह गुरु द्रोही कहलाता है। ऐसे व्यक्ति से भक्ति चर्चा करने में उपदेशी को दोष लगता है। उसकी भक्ति समाप्त हो जाती है।
गरीब, गुरु द्रोही की पैड़ पर, जे पग आवै बीर। चैरासी निश्चय पड़ै, सतगुरु कहैं कबीर।।
कबीर, जान बुझ साची तजै, करै झूठे से नेह। जाकी संगत हे प्रभु, स्वपन में भी ना देह।।
अर्थात् गुरु द्रोही के पास जाने वाला भक्ति रहित होकर नरक व लख चैरासी जूनियों में चला जाएगा।
जुआ निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
जुआ–तास कभी नहीं खेलना चाहिए।
कबीर, मांस भखै और मद पिये, धन वेश्या सों खाय। जूआ खेलि चोरी करै, अंत समूला जाय।।
नाच–गान निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
किसी भी प्रकार के खुशी के अवसर पर नाचना व अश्लील गाने गाना भक्ति भाव के विरूद्ध है। जैसे एक समय एक विधवा बहन किसी खुशी के अवसर पर अपने रिश्तेदार के घर पर गई हुई थी। सभी खुशी के साथ नाच–गा रहे थे परंतु वह बहन एक तरफ बैठ कर प्रभु चिंतन में लगी हुई थी। फिर उनके रिश्तेदारों ने उससे पूछा कि आप ऐसे क्यों निराश बैठे हो? आप भी हमारे की तरह नाचों, गाओ और खुशी मनाओ। इस पर वह बहन कहती है कि किस की खुशी मनाऊँ? मुझ विावा का एक ही पुत्र था वह भी भगवान को प्यारा हो चुका है। अब क्या खुशी है मेरे लिए? ठीक इसी प्रकार इस काल के लोक में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति है। यहाँ पर गुरु नानक देव जी की वाणी है कि:-
ना जाने काल की कर डारै, किस विधि ढल पासा वे।
जिन्हादे सिर ते मौत खुड़गदी, उन्हानूं केड़ा हांसा वे।।
साध मिलें साडी शादी (खुशी) होंदी, बिछड़ दां दिल गिरि (दुःख) वे।
अखदे नानक सुनो जिहाना, मुश्किल हाल फकीरी वे।।
कबीर साहेब जी महाराज भी कहते हैं कि:--
कबीर, झूठे सुख को सुख कहै, मान रहा मन मोद।
सकल चबीना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद।।
कबीर, बेटा जाया खुशी हई, बहुत बजाये थाल।
आवण जाणा लग रहा, ज्यों कीड़ी का नाल।।
छूआछात निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
हम सब एक मलिक के बंदे हैं। भगवान ने किसी भी जाती या मज़हब के स्त्री पुरुषों में कोई अंतर नहीं किया तो हम क्यूँ करें?
दहेज लेना तथा देना निषेध
Jagat Guru Rampal Ji
संत रामपाल जी महाराज
दहेज लेना व देना कुरीति है तथा मानव मात्र की अशांति का कारण है। उपदेशी के लिए मना है। जिसने अपने कलेजे की कोर पुत्री को दे दिया फिर बाकी क्या रहा?
विशेष: स्त्री तथा पुरूष दोनों ही परमात्मा प्राप्ति के अधिकारी हैं। स्त्रिायों को मासिक धर्म (menses) के दिनों में भी अपनी दैनिक पूजा, ज्योति लगाना आदि बन्द नहीं करना चाहिए। किसी के देहान्त या जन्म पर भी दैनिक पूजा कर्म बन्द नहीं करना है।
नोट :–– जो भक्तजन इन इक्कीस सुत्रीय आदेशों का पालन नहीं करेगा उसका नाम समाप्त हो जाएगा। यदि अनजाने में कोई गलती हो भी जाती है तो वह माफ हो जाती है और यदि जान बुझकर कोई गलती की है तो वह भक्त नाम रहित हो जाता है। इसका समाधान यही है कि गुरुदेव जी से क्षमा याचना करके दोबारा नाम उपदेश लेना होगा।