परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं

परमेश्वर कबीर जी की ज्ञान लीलाएं
धरती पर सतलोक संत रामपाल जी महाराज ने उतार दिया है सतलोक आश्रम में

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

सत्यमेव जयते .... आओ एक सच्चाई पर नजर युग परिवर्तन का बीज ..

 बताओ, आज तक हम कभी हारे हैं क्या ? आप हमारा इतिहास उठाकर देखो , 2006 से 2025 तक का। 2006 में तो हम संख्या में बहुत कम थे , आज की तुलना में 2% थे । यानी उस समय हम 2 थे तो आज हम 100 है । और जब हम 2 थे , तब हमारे ऊपर हमला हुआ और हमलावरों को तत्कालीन मुख्यमंत्री ने 50 - 50 हजार का इनाम दिया । जो मुख्यमंत्री हमारे खिलाफ था , सेंट्रल में भी उन्हीं की सरकार थी । मीडिया ने सब कुछ झूठ दिखाया , हमें बदनाम किया , हमारा 1 ही तो आश्रम था छोटा सा , 2 एकड़ में । उसे भी हमसे छीन कर हमें बेघर कर दिया । हमारे मुख्या, हमारे भगवान , हमारे गुरुजी पर हत्या का झूठा मुकदमा 2006 में बना दिया गया। फिर हम हाइकोर्ट से जीते , लेकिन सरकार ने हाइकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया , फिर हम सुप्रीम कोर्ट में भी जीते । 2008 में जमानत पर हमारे भगवान बाहर आए , लेकिन तब तक हालत बदल चुके थे , जो 2 थे अब वो 4 हो चुके थे । यानी कि गुरुजी के जेल में होते हुए भी संगत दुगुनी हो चुकी थी । अभी तक हमारे विरोध में मूलरूप से सरकार , प्रशाशन और मीडिया थी । सरकार का तो वोट बैंक का चक्कर था , प्रशासन तो सरकार की कठपुतली होती ही है और मीडिया को TRP चाहिए थी । लेकिन कहते है कि जिस पर इस संसार का कोई भय काम न करे , वही संत / शूरमा होता है । जेल से जमानत पर आने के बाद भी संत रामपाल जी ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा , उन्होंने भ्रष्ट न्यायतंत्र की पोल खोलनी शुरू की और इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ 3 पुस्तके लिखी । 

1) भ्रष्ट जज कुमार्ग पर ।

2) न्यायलयों की गिरती गरिमा ।

3) सच बनाम झूठ । 

इन पुस्तकों की 1 लाख से अधिक प्रतियां हरियाणा के सभी वकीलों , जजों तक पहुंचाई । और सबसे पहले ये पुस्तके उन जजों के चैंबर में पहुंचाई जिनका नाम और उनके भ्रष्टाचार के प्रमाण इन पुस्तकों में थे , और वो संत जी के केस की सुनवाई भी कर रहे थे । अब यह सिद्ध हो चुका था कि भय भी जिनसे भयभीत होता है उस महापुरुष का नाम है "संत रामपाल जी महराज" । समय बीतता गया , संत रामपाल जी और उनके अनुयायि सभी प्रकार के विरोध और अत्याचार को सहन करते हुए परमात्मा के सत्य ज्ञान का प्रचार करते रहे । इस बीच भी देश के अलग अलग हिस्सों से संत रामपाल जी की पुस्तकों पर केस दर्ज हुए , लेकिन सब केसों में संत जी बरी होते गए। अब हमारी संख्या 4 से 10 हो चुकी थी । एक निर्दोष संत 2006 से 2014 तक तारीख पर तारीख झेलते रहे। अब समय था इस सिस्टम का विरोध करने का । और इस विरोध का अंजाम तो सर्वविदित था । लेकिन जैसा कि मैने पहले भी लिखा कि हर प्रकार का डर संत रामपाल जी महराज के चरणों में आकर नतमस्तक होता है । बरवाला कांड हुआ , 6 शूरवीर भक्तों का सर्वोच्च बलिदान हुआ , फिर से झूठे केस संत रामपाल जी महराज पर मढ़े गए । लगातार 5 FIR, FIR No. 426,427,428,429,430/2014 दर्ज हुई , हर FIR में कम से कम 15-20 धाराओं के तहत केस दर्ज हुए , यानी कि 5 केसों में कुल मिलाकर कम से कम भी 80 -100 धाराएं संत जी पर दर्ज हुई । संत रामपाल जी को पुन बदनाम किया गया , संत रामपाल जी के साथ उनके 950 भक्तों को भी अलग अलग धाराओं में जेल भेजा गया । लेकिन सत्यमेव जयते । धीरे धीरे संत रामपाल जी महराज सभी केसों में बरी होते गए , उधर सरकार पर नकली गुरुओं ने दबाव बढ़ाया , वोट बैंक का सवाल था , सरकार ने निचली अदालत के जजों पर दबाव और लालच दिया । जिसके फलस्वरूप संत रामपाल जी महराज के साथ 2018 में फिर से सरासर अन्याय हुआ । सारे गवाह संत रामपाल जी महराज के पक्ष में थे , मेडिकल रिपोर्ट चीख चीख कर संत रामपाल जी का समर्थन कर रही थी , मृतकों के परिजन जोकि संत रामपाल जी के शिष्य भी थे , सबने संत रामपाल जी महराज के पक्ष में गवाही दी , उसके बावजूद सब गवाहों और साक्ष्यो को दरकिनार करते हुए भ्रष्ट जज Dr. D R Chaliya ने 2018 में उस संत जी को उम्रकैद की सजा सुनाई जिसकी उम्र का लेखा जोखा तो स्वयं धर्मराज के पास भी नहीं था । संत जी मुस्कराए , और जज साहब को धन्यवाद किया । अदालत के इस फैसले को पंजाब & हरियाणा हाइकोर्ट में चैलेंज किया गया। 7 साल के लंबे संघर्ष के बाद माननीय हाइकोर्ट ने सत्य का पक्ष लेते हुए दोनों केसों FIR no 429, 430/ 2014 में निचली अदालत के फैसले को निलंबित करके संत रामपाल जी महराज की सजा पर रोक लगा दी । और फिर से हमारी जीत हुई । इस बीच गुरुजी ने हमें कई बार बताया कि बच्चों अभी तो खेल जारी है , हार जीत का फैसला तो अंत में होता है । इसलिए निराश नहीं होना , अपने गुरुजी को अपने साथ समझना। और समझना क्या था इसमें , यह तो हर भगत का अनुभव है , उन्होंने हर समय अपने गुरुदेव को अपने संग पाया था । लिखने को तो और भी बहुत कुछ है, लेकिन इतना काफी है । यह पोस्ट मैने विरोधियों के लिए लिखी है , कि अंधभक्ति से तुम्हारी बुद्धि में गोबर भर चुका है , तुम्हारा विरोध हमारा प्रचार है लेकिन दुख इस बात का है कि तुम अपने जीवन को संत रामपाल जी का साथ देकर सफल बना सकते थे , लेकिन तुम तो कोरा पाप इकट्ठा करने में लगे हो । और सुनो अब तो हम 10 से 100 हो चुके है । तुम्हारी 7 पुश्ते भी एक साथ आ जाए , तो भी हमें झुका नहीं पाएगी । क्योंकि हम सत्य के साथ खड़े हैं और सत्यमेव जयते , सत्य की सदा से ही जीत होती आई है और अब तो सत्य के साथ स्वयं परमात्मा खड़े है । इसलिए हे पाखंडियों! विरोध और पाखंड छोड़ो और कबीर भजो। 

सत साहेब, सत कबीर। 

संत रामपाल जी महराज भगवान की जय हो ।


#SantRampalJiMaharaj 

#SatlokAshram
















सोमवार, 29 दिसंबर 2025

मृत्यलोक के ब्रह्मांडो का संचालन कौन करता है ?

📘 तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा रचित
ज्ञान गंगा (Gyan Ganga)


“ज्ञान गंगा” तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा रचित एक महान आध्यात्मिक ग्रंथ है, जिसमें वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, पुराण, बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब के शास्त्र प्रमाणों के आधार पर पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब का तत्वज्ञान दिया गया है।

🔱 सृष्टि रचना का सत्य

इस ब्रह्मांड का संचालन काल (क्षर पुरुष) करता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जन्म-मरण के बंधन में हैं। इन सबसे परे कबीर परमेश्वर हैं, जो सतलोक के स्वामी हैं।

🕉️ शास्त्रानुकूल भक्ति का महत्व

गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में अर्जुन से कहा गया है कि तत्वदर्शी संत की शरण में जाकर ही यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मनमानी पूजा से मोक्ष संभव नहीं।

🌼 मानव जीवन का उद्देश्य

  • जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति
  • सतलोक की प्राप्ति
  • पूर्ण परमात्मा की भक्ति

📞 नाम दीक्षा हेतु मिस कॉल करें

📱 8193819381

तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेने के लिए मिस कॉल करें।


📺 साधना टीवी पर सत्संग

🕢 रोज शाम 07:30 बजे से 08:30 बजे तक
तत्वज्ञान आधारित सत्संग अवश्य सुनें।


🔗 महत्वपूर्ण लिंक


📖 “ज्ञान गंगा” — अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाली दिव्य पुस्तक

जय कबीर साहेब 🙏

आध्यात्मिक सत्य : शास्त्र, साधना और प्रलय का रहस्य जानिए यहां ..

🔱 आध्यात्मिक सत्य : शास्त्र, साधना और प्रलय का रहस्य 🔱

यह लेख गीता, उपनिषद और संतवाणी के आधार पर आध्यात्मिक प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देता है।


❓ 1. मनुष्य ना चाहते हुए भी पाप क्यों करता है?

श्रीमद्भगवद्गीता 3.36–37 में अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य इच्छा के विरुद्ध पाप क्यों करता है।

उत्तर: काम, क्रोध और लोभ — जो रजोगुण से उत्पन्न होते हैं — मनुष्य को पाप कर्मों में प्रवृत्त करते हैं।

❓ 2. ब्रह्मरंध्र क्या है? नहीं खुला तो क्या होता है?

ब्रह्मरंध्र सिर के शीर्ष पर स्थित वह दिव्य द्वार है जिससे आत्मा के निकलने पर पुनर्जन्म समाप्त हो जाता है।

  • पूर्ण गुरु से दीक्षा
  • सत्य नाम-स्मरण
  • अहंकार का त्याग

यदि ब्रह्मरंध्र नहीं खुलता, तो आत्मा अन्य द्वारों से निकलकर पुनर्जन्म में जाती है।

❓ 3. कमल (चक्र) खुलने पर भक्ति शक्ति कैसे बढ़ती है?

शरीर के सूक्ष्म कमल ऊर्जा केंद्र हैं। इनके जाग्रत होने पर:

  • मन अंतर्मुखी होता है
  • प्राण स्थिर होता है
  • नाम-स्मरण गहरा होता है

👉 भक्ति भावना नहीं, आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है।

⏳ 4. कल्प, महाकल्प और दिव्य महाकल्प

  • कल्प: ब्रह्मा का 1 दिन = 4.32 अरब वर्ष
  • महाकल्प: ब्रह्मा के 100 वर्ष
  • दिव्य महाकल्प: सतलोक का समय — कालातीत

🔥 5. तीन महाप्रलय का सत्य

  1. नैमित्तिक प्रलय – ब्रह्मा की रात्रि
  2. प्राकृत प्रलय – ब्रह्मांड व देवताओं का नाश
  3. दिव्य महाप्रलय – काल, माया और सृष्टि का अंत

❓ 6. क्या काल और दुर्गा अमर हैं?

नहीं। शास्त्रों के अनुसार काल (क्षर ब्रह्म) और दुर्गा (प्रकृति) भी तीसरी दिव्य प्रलय में समाप्त होते हैं।

❓ 7. तीसरी दिव्य महाप्रलय कौन करता है?

यह प्रलय परम अक्षर ब्रह्म (सतपुरुष) की सत्ता से होती है।

👉 केवल सतलोक और मुक्त आत्माएँ शेष रहती हैं।

❓ 8. सत्य कहना निंदा है क्या?

शास्त्र प्रमाण सहित कहा गया सत्य निंदा नहीं बल्कि चेतावनी और सुधार है।

“निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय” – कबीर साहेब


🌼 निष्कर्ष 🌼

✔ पाप का कारण काम है
✔ मोक्ष का द्वार ब्रह्मरंध्र है
✔ भक्ति शक्ति है, भावना नहीं
✔ सत्य कहना धर्म है, निंदा नहीं

📌 शास्त्र पढ़िए • सत्य जानिए • अंधविश्वास से बचिए

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

निःशुल्क पुस्तक वितरण सेवा

📘 ज्ञान गंगा पुस्तक निःशुल्क वितरण

जनहित में —  पुस्तक बिल्कुल FREE आपके घर भेजी जाएगी, विवरण भरिए ....

नोट: 30 दिनों के भीतर आपके द्वारा दिए गए पते पर यह पवित्र पुस्तक पहुँचा दी जाएगी।

छिपे सच्चे परमेश्वर का धरती पर अवतरण प्रमाण देखिए

❤️🙏 परमात्मा का अवतरण 🙏❤️

परमात्मा भारत में अवतरित हो चुके हैं
सर्वोच्च संत के रूप में

✨ स्वर्ण युग की भविष्यवाणी ✨

विश्व प्रसिद्ध भविष्यवक्ता फ्लोरेंस (न्यू जर्सी, अमेरिका) ने कुछ दशक पूर्व अपनी पुस्तक “Golden Light of a New Era” में एक महान आध्यात्मिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की थी।

“मैं उत्तर भारत के एक पवित्र क्षेत्र को स्पष्ट देख सकती हूँ, जहाँ एक महान संत कठोर साधना में लीन होकर ऐसी दिव्य ऊर्जा का संचार करेंगे, जो सम्पूर्ण विश्व में युग परिवर्तन का कारण बनेगी।”

फ्लोरेंस के अनुसार इस संत की क्रांतिकारी आध्यात्मिक सोच विचार-क्रांति (Thought Revolution) को जन्म देगी, जिससे पूरी मानवता एक सूत्र में बँध जाएगी।

🌍 एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक मार्गदर्शक

भविष्यवाणी के अनुसार विभिन्न धर्मों के अनुयायी इस महान संत को अपने-अपने दृष्टिकोण से पहचानेंगे — मुस्लिम उन्हें पैग़म्बर मोहम्मद के रूप में, ईसाई प्रभु यीशु के रूप में और हिंदू उन्हें परमात्मा का 10वाँ अवतार मानेंगे।

📘 भविष्यवाणियों की सच्चाई

फ्लोरेंस ने वर्ष 2000 से पहले भूकंप, पर्यावरण असंतुलन, नैतिक पतन और वैश्विक अशांति की भी भविष्यवाणी की थी, जिनमें से अनेक घटनाएँ आज साकार हो चुकी हैं।

🌿 उत्तर भारत के महान संत 🌿

वे संत और कोई नहीं बल्कि तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ही है

संस्थापक – सतलोक आश्रम, बरवाला (हिसार), भारत

वे परमेश्वर परमात्मा कबीर का सत्य आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान कर मानवता को मोक्ष और विश्व शांति की ओर मार्गदर्शन कर रहे हैं।

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विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक पुस्तक
“ज्ञान गंगा”
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Supremegod God Has Come seeProof Here

❤️🙏 The Supreme GOD Has Appeared 🙏❤️

The Supreme GOD has come to India in the form of
Supreme Saint :contentReference[oaicite:1]{index=1}

✨ Prediction of a Golden Era ✨

The world-famous forecaster Florence, a highly intellectual divine seer from New Jersey (USA), made a historic proclamation decades ago in her book “Golden Light of a New Era”.

“I can clearly see a sacred region of North India where a saint immersed in intense spiritual practices radiates a divine flow capable of transforming the entire world. His revolutionary thoughts shall ignite a global Thought Revolution.”

According to Florence, this great saint would re-establish spirituality, unite humanity under the concept of One World – One Human Religion, and inspire a global transformation of consciousness.

🌍 A Universal Spiritual Guide

Florence stated that followers of different faiths would recognize this saint according to their belief systems — as Prophet Mohammad, Lord Jesus Christ, or the 10th Avatar of God — due to his extraordinary divine energy and spiritual wisdom.

📘 Authenticity of Florence’s Prophecies

Florence also foretold earthquakes, environmental imbalance, social unrest, and moral decline before the year 2000 — many of which have already come true across India and the world, proving the accuracy of her foresight.

🌿 The Saint from North India 🌿

That saint is none other than
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Founder of Satlok Ashram, Barwala (Hisar), India

He provides true spiritual knowledge of Supreme GOD Kabir and guides humanity towards salvation and world peace.

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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

क्या गीता में व्रत रखने को मना किया गया है

 गीता के अनुसार: क्या व्रत (पूरी तरह भूखा रहना) सही है?


अक्सर यह मान लिया जाता है कि धार्मिक होना मतलब व्रत रखना और व्रत का अर्थ भूखा रहना।

लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता इस विचार का समर्थन नहीं करती।


भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता में स्पष्ट कहते हैं कि न तो बहुत अधिक खाना योग है और न ही बिल्कुल न खाना।


गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में कहा गया है:


नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति

न चैकान्तमनश्नतः।

न चाति स्वप्नशीलस्य

जाग्रतो नैव चार्जुन॥


इसका सीधा अर्थ है:

जो बहुत खाता है उसका भी योग नहीं होता, और जो बिल्कुल नहीं खाता यानी पूरी तरह भूखा रहता है, उसका भी योग नहीं होता। जो बहुत सोता है या बहुत जागता है, वह भी योग में सफल नहीं हो सकता।


यहाँ “न च एकान्तम् अनश्नतः” शब्दों से भगवान पूरी तरह भूखे रहने को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं।


इसके तुरंत बाद गीता अध्याय 6 श्लोक 17 में संतुलन का सिद्धांत बताया गया है:


युक्ताहारविहारस्य

युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य

योगो भवति दुःखहा॥


अर्थ यह है कि जिसका भोजन संतुलित है, जिसका विहार और कर्म संतुलित हैं, और जिसका सोना–जागना संतुलित है, उसी का योग दुःखों को नष्ट करने वाला होता है।


इससे साफ होता है कि गीता का मार्ग अति का नहीं, संतुलन का है।


फिर प्रश्न उठता है कि कठोर व्रत और लंबे उपवास की परंपरा कहाँ से आई?


यह गीता से नहीं आई। यह बाद की सामाजिक परंपराओं, कर्मकांड, दिखावे और अहंकार से जुड़ी साधनाओं से विकसित हुई। स्वयं गीता ऐसे तप की आलोचना करती है।


गीता अध्याय 17 श्लोक 5 और 6 में कहा गया है कि जो लोग शास्त्र के विरुद्ध, दिखावे और अहंकार से शरीर को कष्ट देने वाला तप करते हैं, वे आसुरी प्रवृत्ति के होते हैं।


गीता में व्रत का वास्तविक अर्थ भूखा रहना नहीं है।

व्रत का शास्त्रीय अर्थ है संयम, विवेक और धर्म-संकल्प।


अर्थात:

इंद्रियों का संयम

संतुलित जीवन

अहंकार का त्याग

और कर्तव्य का पालन


इसलिए निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है:


पूरी तरह भूखा रहना, शरीर को तोड़ने वाला व्रत और हठयोग – गीता के अनुसार योग नहीं है।

संतुलित भोजन, संतुलित जीवन और विवेकपूर्ण साधना – यही गीता का मार्ग है।


गीता भूखे साधु नहीं बनाती,

गीता संतुलित, विवेकशील और जागरूक योगी बनाती है।



ज्यादा जानकारी हेतु देखिए साधना टीवी पर रोज शाम 07:30 बजे से 8:30 बजे तक


Supremegod.org

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

श्री रामचंद जी को वनवास कब शुरू हुआ और कब 14 साल पूरे हुए जानिए यहां

 श्री राम चंद्र जी को वनवास कब शुरू हुआ और कब 14 साल पूरे हुए ?

पहली दीपावली कब मनाई गई आइए जानते है यहां ?

जो गलती आज  कलयुग का एक अच्छा पुरुष नहीं कर सकता वो एक गलती पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तम श्री राम कैसे कर सकते है?  आईए जानते हैं...

अध्ययन करने पर पाया गया है कि श्री राम चंद जी को वनवास चैत माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को शुरू हुआ और चैत माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को 14 साल पूरे हुए थे ,और उस अष्टमी की रात भगवान राम सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे थे, अयोध्या वासियों ने खुशी में दीपावली मनाई,  2 साल बाद श्री राम चंद्र ने बेकसूर पवित्र पत्नी को घर से राज्य से निकाल कर वन में छोड़ दिया। माता सीता को न तो पत्नी के अधिकार के तहत रोटी कपड़ा मकान दिया। न ही अयोध्या के नागरिक होने के नाते रोटी कपड़ा मकान दिया।  एक ऐसी सजा दी जो उन्होंने अपने जीवन काल में बड़े बड़े अपराधियों को भी नहीं दी होगी। इसके मूल कारणों को  बाल्मीकि और तुलसीदास ने विस्तार से लिखा नहीं है। लेकिन जितना लिखा है वो भी आज आम  इंसान जो अच्छाइयों से भरा हो अपने घर परिवार में पत्नी के साथ कभी नहीं करता। फिर जो इंसानी में श्रेष्ठ हो यानि पुरुषों में श्रेष्ठ हो फिर वो ऐसा कैसे कर सकता है ? लेकिन दुखद उन्होंने ऐसा करके मानवता का उच्च दर्जा को गिराया है।  उनके इस कार्य से अयोध्या की अच्छी जनता बहुत दुखी हुई और इस दुख शौक में उसने फिर कभी दीपावली नहीं मनाई। त्रेता के बाद द्वापर मे युग में भी दीपावली मनाने के कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं। 
कलयुग में भी गुलामी से पहले दीपावली मनाने के कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं। 
गुलामी के दौर में वह ज्ञान, इतिहास धूमिल हो गया। और आने वाली पीढ़ियां को वह जान इतिहास ट्रांसफर हुआ नहीं। नतीजा यह रहा कि गुलामी के समय नई पीढ़ियां ने सुनी सुनाई बातों के आधार पर , अटकलों के आधार पर, मनमाने आचरण शुरू किए। जिस कारण लोग दीपावली चैत माह में न मना कर कार्तिक माह की अमावस्या को मनाने लगे, जिस कारण संसार को लाभ के बजाय हानि होने लगी। और लोग तेजी से नास्तिक बनने लगे। जब लोग भगति साधना के नाम पर शास्त्र विरुद्ध मनमाने आचरण करती है तब दंड स्वरूप कुदरत संसार पर कहर बरसाती है। इतिहास इस बात का गवाह है। देवी भागवत पुराण में सत्य कथा आती है कि देवी दुर्गा जी ने एक गलती के आधार पर ब्रह्मा जी को शाप दिया कि तुम्हारी जग में पूजा नहीं होगी, और तुम्हारे वंशजों को भी सत्य का जान नहीं होगा ,खुद बोलकर संसार का नाश करेंगे। ब्रह्मा जी के वंशज ब्राह्मण हुए। सतयुग से लेकर आज तक ब्राह्मण देवी दुर्गा जी के शाप से शापित है । जिस कारण इनके पास वास्तविक सत्य नहीं है केवल झूठ है इनके पास। ये हृदय से भले ही बहुत अच्छे हो लेकिन शाओ के कारण ये न चाहते हुए भी अज्ञान को बढ़ावा दे रहे है और संसार का नाश कर रहे है।  गीता जी में भगवान ने कहा कि मेरी माया के अज्ञान जाल से बचाने वाला तत्वदर्शी संत अपने तत्वज्ञान से जीवो को मुक्त करता है और सत्य भरी देकर मुख धाम ,परम शांति लोक सनातन लोक को ले जाता है। तत्वदर्शी संत एक समय में एक ही होता है, वहीं सदगुरु होता है। वह सनातन लोक से आया हुआ परम शक्ति होता है। आज हमारे लिए खुश खबरी है कि आज सर्व रहस्यों को बताने वाला, अज्ञान माया को तत्वज्ञान से काटने वाला, मुक्ति देने वाला परम शांति देने वाला , सनातनलोक लेजाने वाला परम तत्वदर्शी संत रामपाल जी रूप में साक्षात् परमेश्वर कवि जी लीलाएं कर रहे हैं। सुप्रीम गॉड डॉट ओ आर जी वेबसाइट पर जाकर देखिए आगे के असंख्य रहस्य प्रमाणों सहित।। यहां तत्वज्ञान की पढ़ाई करके आप वास्तविक ज्ञानी, जानकर ,विद्वान बनोगे यह मेरी गारंटी है। साधना टीवी पर मिलिए रोज शाम 07:30 से
 08: 30 बजे तक  धन्यवाद। 
(( सच्चा सनातन धर्मी की कलम से ))





गुरुवार, 2 जनवरी 2025

अजर अमर सनातन लोक vs स्वर्ग लोक इंपोर्टेंट जानकारी

अजर अमर स्व प्रकाशित सत्य सनातन लोक में ही पहले सब रहते थे। वहां ब्रह्म ने तप करके परमेश्वर से मृत्युलोक प्राप्त किया और बाद में हम असंख्य आत्माएं इस ब्रह्म के बहकावे में आकर सतलोक छोड़कर इस मृत्युलोक में आए थे। जिस गलती का दंड सर्व आत्माएं यहां कष्ट दुख इत्यादि के रूप में भोग रही हैं। ब्रह्म ने अपनी माया से सर्व आत्माओं का याददाश्त रूपी सच्चा जान हर लिया और झूठा अज्ञान भर दिया । जिस कारण आत्माओं को अब अपना इतिहास जान याद नहीं और घर वापस जाने की भी कोई चिंता न रही। यहां आत्माओं के कष्ट से द्रवित होकर परमेश्वर इस मृत्युलोक के धरती पृथ्वी कर हर युग में आकर साधारण मनुष्य की तरह लीला करके सर्व सत्य बताता है। और विशेष शक्ति युक्त मंत्र देकर भगति को शक्ति से युक्त करके वापस अजर अमर निज धाम सतलोक  ले जाता है। जिसे परम गति ,परम मोक्ष इत्यादि कहां गया। जहां जाने के बाद जीव जन्म मरण से मुक्त हो जाता है। और उसी सत्यलोक की दुनिया में अपने परिजन आत्माओं के साथ परम आनंद के साथ रहता है।  स्वर्ग लोक एक छोटा सा रेस्टोरेंट टाइप एक होटल जैसा स्थान है। जो पुण्य कर्मी आत्माओं को रहने के लिए दिया जाता है। जब पुण्य को शक्ति खत्म हो जाती है तो वापस धरती पर भेज दिया जाता है। आईए जानते है शास्त्रों से  दोनों का अंतर..


🔹 स्वर्ग लोक और सतलोक में अंतर


श्रीमद्देवी भागवत पुराण के तीसरे स्कन्ध के पृष्ठ 123 के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी नाशवान हैं यानी देवताओं का स्वर्गलोक भी नाशवान है।


जबकि संत गरीबदास जी महाराज ने मोक्ष स्थान सतलोक के विषय में कहा है:


ना कोई भिक्षुक दान दे, ना कोई हार व्यवहार। 

ना कोई जन्मे मरे, ऐसा देश हमार।।


🔹 सतलोक Vs स्वर्ग


हम सभी जानते हैं यह लोक नश्वर है यानी जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होगी और यह चक्र स्वर्गलोक से लेकर ब्रह्मलोक तक चलता है।


जबकि सतलोक, वह मोक्ष स्थान है जहाँ जन्म मृत्यु का दुःख नहीं है। बल्कि वहाँ सुख ही सुख है। इसलिए संतों ने मोक्ष स्थान सतलोक को सुख सागर कहा है। संत गरीबदास जी ने इस बारे में कहा है:


जहां संखों लहर मेहर की उपजैं, कहर जहां नहीं कोई।

दासगरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई।।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


मोक्ष वह स्थान है जहाँ जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था का दुःख नहीं होता।


गीता अध्याय 8 श्लोक 16 के अनुसार, स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में गए प्राणियों का भी पुनर्जन्म होता है।


वहीं, गीता अध्याय 18 श्लोक 62 के अनुसार, मोक्ष का स्थान सतलोक है जहाँ कोई कष्ट नहीं है बल्कि वहाँ परम शांति है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक सहित काल ब्रह्म के 21 ब्रह्मांडों में शांति व सुख का नामोनिशान नहीं है। त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, मान-बड़ाई रूपी अवगुण हर जीव को इन लोकों में परेशान किए हुए हैं। जबकि सतलोक में केवल एक रस परम शांति व सुख है। जब तक हम सतलोक में नहीं जाएंगे तब तक हम परमशांति, सुख व मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते। जिससे स्पष्ट है कि सतलोक ही मोक्ष स्थान है।


🔹मोक्ष स्थान सतलोक


मोक्ष स्थान वह स्थान है जहाँ अजर-अमर स्थिति होती है और जहाँ जाने के बाद प्राणी का जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है।


धर्म शास्त्रों के अनुसार, स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक नाशवान हैं जबकि सतलोक (सनातन परम धाम) अविनाशी लोक है। क्योंकि सतलोक में जाने के बाद साधक को लौटकर संसार में वापस नहीं आना पड़ता। इसलिए मोक्ष स्थान सतलोक है।


🔹 सतलोक Vs स्वर्ग


सतलोक वह मोक्ष स्थान है जहां जन्म-मृत्यु, वृद्धावस्था या अन्य दुख व पीड़ा नहीं होती, जो इसे स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक से श्रेष्ठ बनाता है।


स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक के देवता और 21 ब्रह्मांड का स्वामी काल ब्रह्म भी नाशवान हैं।


🔹सतलोक में आत्मा को पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है, जो स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में असंभव है। स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक की आत्माएं जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधी रहती हैं, जबकि सतलोक में आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग

सतलोक जाने के बाद आत्मा का पूर्ण मोक्ष हो जाता है जिससे आत्मा को 84 लाख योनियों का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जबकि स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में जाने के बाद आत्मा को कर्मों के आधार पर स्वर्ग, नरक, 84 लाख योनियों का कष्ट भोगने के बाद पुनः पृथ्वी पर जन्म-मृत्यु के चक्र में आना पड़ता है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


मोक्ष वह स्थान है जहाँ जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था का दुःख नहीं होता।


गीता अध्याय 8 श्लोक 16 के अनुसार, स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में गए प्राणियों का भी पुनर्जन्म होता है।


वहीं, गीता अध्याय 18 श्लोक 62 के अनुसार, मोक्ष का स्थान सतलोक है जहाँ कोई कष्ट नहीं है बल्कि वहाँ परम शांति है।


🔹सतलोक Vs स्वर्ग


गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्मलोक तक सभी लोक और उनमें गए हुए प्राणी पुनरावृत्ति यानी जन्म-मृत्यु के चक्र में हैं। अर्थात ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक तक गए प्राणियों का मोक्ष नहीं होता।


जबकि गीता अध्याय 18 श्लोक 62 और अध्याय 15 श्लोक 4 में सनातन परम धाम यानी सतलोक का वर्णन किया गया है, जहाँ जाने के बाद लौटकर संसार में नहीं आना पड़ता, यानी पूर्ण मोक्ष प्राप्त हो जाता है। इसलिए मोक्ष स्थान सतलोक है।







सोमवार, 21 अक्टूबर 2024

हम श्राद्ध क्यों मनाते हैं? आइए जानते है सीक्रेट...

मार्कण्डेय पुराण में ‘‘रौच्य ऋषि के जन्म’’ की कथा आती है। एक रुची ऋषि था। वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदों अनुसार साधना करता था। विवाह नहीं कराया था। रुची ऋषि के पिता, दादा, परदादा तथा तीसरे दादा सब पित्तर (भूत) योनि में भूखे-प्यासे भटक रहे थे। जिस समय रूची ऋषि की आयु चालीस वर्ष थी, तब उन चारों ने रुची ऋषि को दर्शन दिए तथा कहा कि बेटा! आप ने विवाह क्यों नहीं किया? विवाह करके हमारे श्राद्ध करना। रुची ऋषि ने कहा कि हे पितामहो! वेद में इस श्राद्ध-पिण्डोदक आदि कर्मों को अविद्या कहा है यानि मूर्खों का कार्य कहा है। फिर आप मुझे इस कर्म को करने को क्यों कह रहे हो? को क्यों कह रहे हो?

पितरों ने भी माना और कहा कि यह बात सत्य है कि श्राद्ध आदि कर्म को वेदों में अविद्या अर्थात् मूर्खों का कार्य ही कहा है। फिर उन पित्तरों ने वेद विरूद्ध ज्ञान बताकर रूची ऋषि को भ्रमित कर दिया क्योंकि मोह भी अज्ञान की जड़ है। रूची ने विवाह करवाया। फिर श्राद्ध-पिण्डोदक क्रियाऐं करके अपना जन्म भी नष्ट किया।

मार्कण्डेय पुराण के प्रकरण से सिद्ध हुआ कि वेदों में तथा वेदों के ही संक्षिप्त रुप गीता में श्राद्ध-पिण्डोदक आदि भूत पूजा के कर्मकाण्ड को निषेध बताया है, नहीं करना चाहिए। उन मूर्ख ऋषियों ने अपने पुत्र को भी श्राद्ध करने के लिए विवश किया। उसने विवाह कराया, उससे रौच्य ऋषि का जन्म हुआ, बेटा भी पाप का भागी बना लिया।

रूची ऋषि भी ब्राह्मण थे। उन्होंने वेदों को कुछ ठीक से समझा था। अपनी आत्मा के कल्याणार्थ शास्त्र विरूद्ध सर्व मनमाना आचरण त्यागकर शास्त्रोक्त केवल एक ब्रह्म की भक्ति कर रहा था। जो उसके पिता तथा उनके पहले तीन दादा जी शास्त्रविधि त्यागकर यही कर्मकाण्ड करते-कराते थे जिसका परिणाम गीता अध्याय 9 श्लोक 25 वाला होना ही था कि पितर पूजने वाले पितरों को प्राप्त होंगे, वही हुआ। अब वर्तमान की शिक्षित जनता को अंध श्रद्धा भक्ति त्यागकर विवेक से काम लेकर गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में कहे आदेश का पालन करना चाहिए। जिसमें कहा है कि इससे तेरे लिए अर्जुन शास्त्र ही प्रमाण हैं यानि जो शास्त्रों में करने को कहा है, वही करें। जो शास्त्रों में प्रमाणित नहीं है, उसे त्याग दें। गीता में परमात्मा का बताया विद्यान है।

🚩श्राद्ध की तैयारी कैसे करें❓

🚩 कर्म योग क्या होता है❓

ऐसे ही आत्मज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़े हुए तथ्यों को जानने के लिए अवश्य पढ़िए पवित्र पुस्तक "ज्ञान गंगा" जो हमारे सभी पवित्र धर्मों के पवित्र सद् ग्रंथों के आधार पर तैयार की गयी है यदि आप यह पुस्तक निशुल्क प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें अपना नाम पूरा पता व मोबाइल नंबर निम्न व्हाट्सएप नंबर पर भेज दें।

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धन्यवाद…😊

पितृ पक्ष , श्राद्ध कर्म के बारे में गीता ज्ञान क्या कहता है ... आइए जानते हैं...

यह कहना शायद ही सही हो…।

आप स्वयं ही विचार करें ! मानव का शरीर 5 तत्वों का है और पितरों का भिन्न संख्या के तत्वों का है। क्या केवल 1 दिन भोजन देने पर पितर तृप्त हो सकते हैं? कभी नहीं। जब वे जीवित थे तो कम से कम दो बार अवश्य भोजन करते थे तो क्या वर्ष में एक दिन भोजन करने से वे तृप्त हो सकते हैं? कदापि नहीं। यह एक नकली कर्मकांड है जिसे नकली धर्मगुरुओं और ब्राह्मणों ने प्रारम्भ करवाया था। व्यक्ति जीवित रहते जैसे कर्म करता है उस आधार पर वह स्वर्ग नरक चौरासी लाख योनियों अथवा भूत, प्रेत या पितर बनने के पश्चात अपना कर्म फल भोगता हैं। हमारे श्राद्ध निकालने से हमारे कर्म खराब होते हैं क्योंकि ये वेद विरुद्ध साधनाएँ हैं जिन्हें वेदों एवं गीता में स्पष्ट रूप से वर्जित किया है और शास्त्र विरुद्ध कर्म करने वाले पाप के भागी होते हैं।

श्राद्ध के बारे में गीता क्या कहती है?

पवित्र गीता जी के अध्याय 9 श्लोक 25 में लिखा है कि भूत पूजने वाले भूत बनेंगे, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होंगे। इससे सिद्ध है कि भूत पूजा, पितर पूजा, श्राद्ध, पिंडदान यह सभी शास्त्रविरुद्ध मनमाना आचरण है। जिससे गीता अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार, न सुख होगा, न कार्य सिद्धि होगी, न गति मिलेगी और न ही पूर्वजों को गति होगी।

अवश्य विचार करें :- जब हिन्दू समाज में किसी की मौत होती है तो पंडितजन बताते हैं कि मृतक की अस्थियों को गंगा में डालने से मोक्ष होगा, फिर कहते हैं कि छमाही, बरसोदि से मोक्ष होगा। इतना करने के बाद जब श्राद्ध आते हैं तो पंडित बताते हैं कि तुम्हारा मरा हुआ बाप तो कौआ बन गया अब उसे श्राद्ध में खाना खिलाओ। ऐसा करने से वह तृप्त हो जाएगा। यदि हमारे माता पिता को कौआ ही बनना था तो हमसे मृत्योपरांत विभिन्न कर्मकांड क्यों करवाए गए? आज काफी परिवार श्रद्धा निकालने के बाद भी पितृ दोष से परेशान हैं तो श्राद्ध निकालना के बाद भी पितृ दोष होने का कारण क्या है? क्या है शास्त्र अनुकूल साधना और कैसे हम अपने पूर्वजों का भी उद्धार करवा सकते हैं?

इन सब के उत्तर विस्तारपूर्वक जानने के लिए मैं आपसे अनुरोध करूंगी कि आप भी गीता जी के अनुसार अध्याय 17 श्लोक 23 में बताए गए मंत्रो का जाप करें जो केवल तत्वदर्शी संत दे सकते हैं जिनकी शरण में जाने के उपरांत हमारे सर्व पाप नाश हो जाएंगे और हमें भूत प्रेतों व पितृ दोष आदि से मुक्ति मिलती है। ये सब जाने एक ही पुस्तक ज्ञान गंगा में। निःशुल्क मंगवाने के लिए + 918630385761 पर व्हाट्सएप करें।

धन्यवाद🙏🏻

नवरात्रि या अन्य कोई भी पूजा पाठ करने से पहले यह शास्त्र ज्ञान जानना जरूरी है अन्यथा उसके लाभ नही मिलते हैं, देखिए रहस्य...

 नवरात्रि शुरू होने से पहले हम जरूरी है कि आप अपने अंदर की बुराइयों कानवरात्रि शुरू होने से पहले हम जरूरी है कि आप अपने अंदर की बुराइयों का त्याग करें और साथ ही ये जान ले की हमारे धर्म शास्त्रों में दुर्गा जी के बारे में क्या तथ्य और जानकारी हैं और माता दुर्गा जी किस साधना करने की और संकेत कर रही हैं? त्याग करें और साथ ही ये जान ले की हमारे धर्म शास्त्रों में दुर्गा जी के बारे में क्या तथ्य और जानकारी हैं और माता दुर्गा जी किस साधना करने की और संकेत कर रही हैं?

देखिए गीता जी अध्याय 6 का श्लोक 16

इससे सिद्ध है कि व्रत रखना (बहुत कम खाना) हमारे शास्त्रों में मना किया गया है अर्थात् यह सब व्यर्थ की साधना है ।

अब देखें गीता जी अध्याय 16 श्लोक 23

इस श्लोक से सिद्ध है कि अगर हम गीता जी के विपरीत साधना करेंगे तो हम मोक्ष ( मानव जीवन का मूल उद्देश्य) की प्राप्ति नहीं कर सकते।

श्रीमद् देवी भागवत पुराण के स्कंद 7, पृष्ठ 562 में देवी द्वारा हिमालय राज को ज्ञान उपदेश में दुर्गा जी स्वयं किसी और भगवान की पूजा करने की बात करती हैं। जहां देवी दुर्गा कहती हैं कि मेरी पूजा को भी त्याग दो और सब बातों को छोड़ दो, केवल ब्रह्म की साधना करो।

इससे सिद्ध है कि हमें सिर्फ पूर्ण परमात्मा की भक्ति साधना करनी चाहिए जो सिर्फ तत्वदर्शी संत ही बता सकते है जिसके विषय में गीता जी के अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा गया है।

वर्तमान समय में वह तत्वदर्शी संत इस धरती पर मौजूद है जो हमारे शास्त्रों के अनुसार भक्ति साधना बता रहे हैं आपसे अनुरोध करूंगी की आप सही भक्ति साधना जानने के लिए अवश्य पढ़ें पुस्तक ज्ञान गंगा निशुल्क मंगवाने के लिए +918630385761 पर व्हाट्सएप करें। पूर्ण परमात्मा कौन है? कैसे उनका पाया जा सकता है? देवी देवता को प्रसन्न करने की कौन से मंत्र हैं? देवी दुर्गा जी से भी ऊपर कौन सी शक्ति है इसके विषय में है श्रीमान देवी भागवत में कह रही है? कैसे हमारे सर्व दुख दूर हो सकते हैं और हम कैसे सुखमय जीवन जी सकते हैं? जानने के लिए अवश्य पढ़िए पुस्तक ज्ञान गंगा।

पूरा पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏🏻

सनातन धर्म क्या है... आइए जानते हैं

 सनातन का मतलब है शाश्वत या 'सदा बना रहने वाला'।

सर्वप्रथम एक आदि सनातन पंथ (धर्म) था। मानव समाज शास्त्रोक्त साधना करता था।

वर्तमान में सनातन धर्म का नाम वैदिक धर्म व हिंदू धर्म भी प्रसिद्ध है।। परंतु अब जो पहले सनातन धर्म में साधना हुआ करती थी अब धीरे-धीरे लोग उसको भूलकर शास्त्र विरुद्ध भक्ति साधना कर रहे हैं।

इसके विषय में संत गरीबदास जी ने सूक्ष्मवेद में कहा है:-

आदि सनातन पंथ हमारा। जानत नहीं इसे संसारा ।। पदर्शन सब खट-पट होई हमरा पंथ ना पावे कोई।। इन पथों से वह पंथ अलहदा पंथों बीच सब ज्ञान है यहदा ।।

हमारा आदि सनातन पंथ है जिसको संसार के व्यक्ति नहीं जानते वह आदि सनातन पंथ अर्थात् सब पंथों से भिन्न है। गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में कहा है कि (पुरा) सृष्टि की आदि में जिस (ब्रह्मणः) सच्चिदानंद घन ब्रह्म की साधना तीन नामों ॐ तत् सत् वाली की जाती थी जो तीन विधि से स्मरण किया जाता है सब ब्राह्मण यानि साधक उसी वेद (जिसमें यह तीन नाम का मंत्र लिखा है) के आधार से यज्ञ साधना करते थे।

आज फिर भारत में सनातन धर्म का पुनरुत्थान हो रहा है। जिस भक्ति साधना को करने से फिर लोगों को वैसे ही सुख का अनुभव हो रहा हैं जो पहले सतयुग के समय हुआ करता था। आप भी अपना मनुष्य जन्म न गवाएं और फिर सनातन धर्म वाली भक्ति साधना करें। जानने के लिए कृप्या पढ़ें पुस्तक हिंदू साहेबान! नहीं समझे गीता वेद पुराण। इस पुस्तक में सनातन धर्म का इतिहास, सही भक्ति साधना, तीर्थ स्थल केदारनाथ, वैष्णो देवी, नैना देवी आदि का निर्माण के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुस्तक की pdf आप इस नम्बर पर message करके मंगवा सकते हैं +918630385761 । इस पुस्तक को पढ़ना न भूलें क्योंकि इसके माध्यम से आप वास्तविक सच्चाई जान सकते हैं जिससे हम हजारों वर्षों से अवगत नहीं थे।

धन्यवाद🙏🏻 

अल्लाह के आदेश के विरुद्ध मुसलमानों को गुमराह किया शैतान में देखिए कैसे ....पड़िए phd ज्ञान यहां...

 بِسْمِ ٱللَّٰهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

बकरीद  अल्लाह के आदेश के विरुद्ध मनमाना आचरण ...पड़िए पूरा लेख.....

चलिए इस answer में मैं आपको कुछ प्रमाण पवित्र मुसलमान धर्म के सद्ग्रंथो से ही देती हूं अगर आप वास्तव में सच्चे मुसलमान हैं तो आपको अपने पवित्र इस्लामिक धर्म के सद्ग्रंथो को तो मानना पड़ेगा...

इस्लामिक मान्यता के अनुसार हज़रत इब्राहिम अपने पुत्र हज़रत इस्माइल को इस दिन खुदा के हुक्म पर खुदा की राह में कुर्बान करने जा रहे थे (बलि देने जा रहे थे) तो अल्लाह ने उनके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है और फिर शुरू हुई परम्परा बकरीद मनाने की।

🤔 पर वास्तव में तो ये सोचने वाली बात है कि अल्लाह ने हज़रत इस्माइल जी को तो जिंदगी दी थी और मुसलमान धर्म के श्रद्धालु बकरा ईद के दिन बकरे को मार कर खाते हैं। अल्लाह ने तो जिंदगी दी और मुस्लिम उस दिन की याद में बकरे की जिंदगी ले लेते है। क्या अल्लाह ऐसे लोगो को बख्शेंगे?

अब कुछ प्रमाणों को पढ़िए:-

• हजरत मुहम्मद जी का जीवन चरित्र” पुस्तक के पृष्ठ 307 से 315 में लिखा है कि हजरत मुहम्मद जी ने कभी खून खराबा करने का आदेश नहीं दिया।

• पवित्र तौरात पुस्तक के अंदर ‘पैदाइश’ में पृष्ठ नंबर 2 और 3 पर लिखा है कि अल्लाह ताला ने मनुष्यों को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया। जो बीज वाले फल हैं, उन्हें मनुष्यों को खाने का आदेश दिया और जीव जंतुओं को घास फूस खाने का आदेश दिया। इस प्रकार परमेश्वर ने छः दिन में सृष्टि रची औऱ सातवें दिन तख्त पर जा विराजा।

और तो और संत गरीबदास जी ने इसके विषय में बताया है की:-

नबी मोहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया ।

एक लाख अस्सी को सौगंध, जिन नहीं करद चलाया ||

अरस कुरस पर अल्लह तख्त है, खालिक बिन नहीं खाली |

वे पैगम्बर पाक पुरुष थे, साहेब के अब्दाली।।

पवित्र मुसलमान धर्म के पैगम्बर हजरत मोहम्मद जी जिस रास्ते पर थे उन प्यारे नबी को आदर्श मानकर समस्त मुस्लिम समुदाय उसी राह पर चल रहा है किंतु मुस्लिमो को वास्तव में उनके धार्मिक गुरुओं द्वारा बहकाया और भरमाया गया है। वर्तमान में सारे मुसलमान मांस खा रहे है परंतु नबी मोहम्मद ने कभी माँस नही खाया तथा न ही उनके सीधे (एक लाख अस्सी हजार) अनुयायियों ने कभी माँस खाया। हजरत मोहम्मद केवल रोजा व नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल (हत्या) नहीं करते थे। हज़रत मुहम्मद इतने दयालु थे कि वे चींटी को भी तंग करना हराम समझते थे।

ये भी विचार करना "बहुत महत्वपूर्ण"

मुसलमान भाई ये भी मानते हैं कि जिस बकरे की बकरीद के दिन कुर्बानी करते हैं, वह बकरा जन्नत में जाता है और उस बकरे का माँस हमारे लिए माँस नहीं बल्कि प्रसाद बन जाता है। यदि बकरे की कुर्बानी करने पर बकरे की रूह को सीधी जन्नत मिलती है तो विचार कीजिये कि जन्नत में तो आपको भी जाना है, तो क्यों न उस बकरे की जगह आप अपनी कुर्बानी दे दो और आप पहले ही जन्नत पहुंच जाओ जबकि वास्तविकता यह है कि इस तरह बकरे की या किसी भी अन्य पशु की कुर्बानी देने से जन्नत नहीं बल्कि सीधा दोजख मिलता है।

मुसलमान का अर्थ है जो इस्लाम में विश्वास करता है और उसके नियमों के अनुसार रहता है।

अगर आप आज सच्चे मुसलमान हो तो आपको ये अवश्य ही मानना पड़ेगा।

क्या कभी सोचा है:-

सूरत 42 आयत 1 में अल्लाह ताला को प्राप्त करने के तीन शब्द बताए हैं: "एन सीन काफ" । क्या आप जानते हैं ये एन सीन काफ आखिर क्या है??

पवित्र कुरान शरीफ सूरत फुरकान 25 आयत 59 में कहा है कि जिस कबीर नामक अल्लाह ताला ने इस सारी सृष्टि की रचना छः दिन में कर दी, वो अल्लाह कबीर बड़ा दयालु है। उस अल्लाह कबीर को प्राप्त करने की विधि किसी बाख़बर अर्थात तत्वदर्शी संत से पूछ देखो। आखिर वो बाखबर वर्तमान हैं कौन??

ऐसे ही इस्लाम धर्म से संबंधित अनेकों प्रश्नों के लिए पढ़ें पाक पुस्तक " मुसलमान नहीं समझे ज्ञान कुरान " । निःशुल्क मंगवाएं इस नंबर से: +918630385761 ।।

धन्यवाद।

श्री कृष्ण के लिए बांसुरी का क्या महत्व है... आइए पढ़ते है सीक्रेट..

 "मुरली मनमोहिनी, बांसुरी बजाए, गोपियां मरक जाए"

श्री कृष्ण जी की बांसुरी उनके जीवन और लीलाओं में एक अहम भूमिका निभाती है। यह माना जाता है कि बांसुरी का स्वर उनके मन को शांति प्रदान करता था और उन्हें गोपियों के साथ रात्रि रास में आकर्षित करने का माध्यम बांसुरी बनती थी। खैर श्री कृष्ण जी की बचपन जीवन लीलाओं से तो आप बखूबी परिचित होंगे जो आपने टीवी,सीरीज, बुक्स में पढ़ी होगी। वो बांसुरी बजाकर गोपियों और क्षेत्र के सभी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करके बुलाते और उन्हें भजन गायन सुनाया करते थे।

पर रुको रुको...बांसुरी से मुझे एक बार पढ़ी हुई एक अद्भुत सच्ची कथा याद आई जो शायद ही आपने पहले कभी सुनी हो। ये कथा है संत मलूक दास जी की जो पहले श्री कृष्ण जी के परमभक्त थे पर उसके पश्चात उन्हें सच्चे सतगुरु मिले जिनकी महिमा का वर्णन उन्होंने बहुत सुंदर तरीके से किया है।

"एक समय गुरू बंसी बजाई, कालंद्री के तीर।
सुर नर मुनिजन थकत भये, रूक गया जमना नीर।
अमृत भोजन म्हारे सतगुरू जीमें, शब्द दूध की खीर।
दास मलूक सलूक कहत है, खोजो खसम कबीर ।।"

अर्थात् संत मलूक दास जी ने स्पष्ट किया है कि परमात्मा कबीर जी का नाम जपा करो। उस (खसम) सर्व के मालिक कबीर जी की खोज करो, उसे पहचानो। सत्य साधना करके सतलोक में कबीर खुदा के पास जाओ। जैसे श्री कृष्ण के विषय में बताया जाता है कि वे बांसुरी मधुर बजाते थे। उसको सुनकर सिर्फ नगरवासी, गोपियाँ व गायें खींची चली आती थी। यानी उनके द्वारा बजाई बांसुरी की आवाज श्री कृष्ण जी की बांसुरी की आवाज से भी मनमोहक थी।
मलूक दास ने बताया है कि एक समय मेरे सतगुरु कबीर जी ने (कालंद्री) जमना दरिया के किनारे बांसुरी बजाई थी जिसको सुनकर स्वर्ग लोक के देवता, ऋषिजन तथा आस-पास के गाँव के व्यक्ति खींचे चले आए थे। और क्या बताऊँ! जमना दरिया का जल भी रूक गया था। मेरे सतगुरू शब्द की खीर खाते हैं यानि अमृत भोजन के साथ-साथ अमर आनंद भी भोगते हैं। संत मलूक दास जी ने आँखों देखा बताया कि कबीर पूर्ण ब्रह्म (कादर अल्लाह) है, श्री कृष्ण से भी सर्वश्रेष्ठ है।
ये अनोखा अद्भुत हैरान कर देने वाला विवरण मैंने तो पहले कभी नहीं पढ़ा था, पर ये पढ़ने को तब मिला जब मुझे प्राप्त हुई पवित्र पुस्तक "हिंदू साहेबान नहीं समझे गीता, वेद, पुराण"। इसका शीर्षक ही झकझोड़ देने वाला है। साथ ही इसमें लिखे श्रीमद्भागवत गीता जी के रहस्य तो आज भी हर पल मेरे मन को छू लेते हैं। भक्ति और भगवान से परिपूर्ण इस पुस्तक ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल मुझे सत्य से अविगत कराया है। अगर आप भी श्री कृष्ण जी और गीता जी के अद्भुत रहस्य जानना चाहते हैं तो आप इस नंबर 
+918630385761 पर व्हाट्सएप करके इसकी pdf निःशुल्क मंगवा सकते हो। "जागो परमेश्वर के चाहने वालो, ढूंढों उस भगवान को जो है श्री कृष्ण से भी सर्वोत्तम"
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आभार :)

🙏🏻